
चंदन सिंह देवड़ा/उदयपुर. बच्चों की स्कूल-कॉलेज फीस जमा नहीं हो पा रही है, बैंक वाले होम लोन की किस्त जमा करवाने के लिए बार-बार रिमाइंडर भेज रहे हैं, घर का खर्चा उधारी पर आ गया है। बीमारी की स्थिति में हालत खराब हो गई है। साहब! अब तो वेतन दे दो। यह पीड़ा भरी दास्तां किसी मजदूर पेशा व्यक्ति की नहीं बल्कि उन सरकारी महकमों के कार्मिकों की है, जो दो से तीन माह से वेतन को तरस रहे है। दिवाली निकट आ गई है, लेकिन परिवार की तो छोड़ो खुद की जरूरतों को दबाकर बैठना इनकी मजबूरी बन गया है। बार-बार अधिकारियों से वेतन जारी करवाने की मांग कर रहे हैं लेकिन वे बजट नहीं होने की बात कहकर टरका रहे हैं। ऐसे जवाब सुनकर परेशान कर्मचारी अब आंदोलन की चेतावनी देने लगे है
खुद की जेब से बना रहे पोषाहार, कार्यकर्ता की जेब खाली
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दो महीने से मानदेय नहीं मिला है। बार- बार एलएस, सीडीपीओ और आला अधिकारियों से गुहार लगाने पर जवाब मिल रहा है कि बजट आने पर मिल जाएगा पैसा। कार्यकर्ता सावित्री, दुर्गा का कहना है कि महज साढ़े सात हजार में घर चलाना पहले ही मुश्किल है। ऊपर से यह पैसा भी समय पर नहीं मिलने से परेशान हो गए है। समय पर वेतन नहीं मिला तो दीपावली फीकी हो सकती है। इधर, आंगनबाड़ी सेंटर पर सत्तू, पंजरी, बेबी मिल्क, पोषाहार देने वाले क्लस्टर के जून से बिल पास नहीं हुए है। ये भी जेब से पैसा लगा कर पोषाहार सप्लाई कर रहे हैं।
होमगार्ड काट रहे हैं चक्कर
पन्नाधाय राजकीय चिकित्सालय में जिन 19 होमगार्ड जवानों ने जुलाई में सुरक्षाकर्मी के तौर पर सेवाएं दी उनका वेतन अभी तक बजट का अभाव बता रोक रखा है, जबकि अगस्त से प्राइवेट सुरक्षाकर्मी लगा दिए गए। कई बार होमगार्ड के ये जवान साढ़े 4 लाख के करीब बकाया वेतन देने की गुहार बाबू से लेकर अस्पताल अधीक्षक से लगा चुके हैं लेकिन इन्हंे पैसा नहीं मिला है। होमगार्ड की सेवाएं रेंडम प्रणाली से चलती है। एेसे में ये आर्थिक परेशानी मे जूझ रहे है।
Updated on:
13 Oct 2019 05:50 pm
Published on:
13 Oct 2019 05:50 pm
