
प्रकाश कुमावत/उदयपुर . मांसाहार के चलन वाले खाड़ी देशों के खाने की डिश में अब सहजना की फलियां शामिल हो गई हैं। इससे भी बड़ी बात यह कि राजस्थान से इसकी सप्लाई होने लगी है, जो यहां बहुतायत में उगती है। खाड़ी देशों की मांग को देखते हुए हाल ही पहली बार एक टन की खेप का निर्यात किया गया है। इसके पहुंचने के साथ ही एडवांस आर्डर भी आ गए हैं। सहजना के पत्तों की भी डिमांड आ रही है। कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार पिछले सप्ताह करीब 1000 किलो सहजना फलियां दुबई भेजी गईं। यह इसके निर्यात की शुरुआत थी। कृषि वैज्ञानिक अब इस फली के संरक्षण, संवर्धन और प्रसंस्करण के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
निर्यात पर अनुदान ताकि दिलचस्पी बढ़ाएं किसान
सहजना की फलियों के विदेशों में निर्यात को प्रोत्साहित करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए इसके समुद्री व हवाई निर्यात पर अनुदान दिया जाएगा। कृषि विपणन बोर्ड की ओर से शुरू की गई फल-सब्जी, फूल निर्यात प्रोत्साहन योजना के तहत सहजना के रासायनिक उत्पाद पर 4.50 रुपए तथा जैविक उत्पाद के 6 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से अनुदान देय है। प्रोडक्ट को बंदरगाह तक पहुंचाने के लिए परिवहन का 25 फीसदी और सतही भाड़े का 30 फीसदी अनुदान दिया जाएगा। हवाई मार्ग से 10 लाख रुपए और समुद्री मार्ग से 15 लाख रुपए की अधिकतम सीमा तक तीन साल के लिए अनुदान देय है। उधर, स्थानीय बाजार में सहजना की फलियां थोक में 20 से 30 रुपए प्रति किलो तक बिक रही हैं, जबकि सरकारी स्तर पर इसकी खरीद 40 रुपए तय की गई है। विदेशों से इसकी डिमांड लगातार बढ़ रही है। इसे देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इसके निर्यात में बढ़ोतरी होगी। कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी का कहना है कि सहजना में एंटीऑक्सीडेंट, एंटीबायोटिक व कई तरह के पौष्टिक तत्व पाए गए हैं। औषधीय गुणों के चलते विदेशों में इसकी डिमांड बढ़ रही है। इसके मद्देनजर सरकार इसे निर्यात को प्रोत्साहन दे रही है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी, वहीं देश में विदेशी मुद्रा भी आएगी।
लेना होगा लाइसेंस
कृषि विपणन बोर्ड की फल-सब्जी, फूल निर्यात प्रोत्साहन योजना के तहत इसके निर्यात के लिए आयात-निर्यात लाइसेंस जरूरी है। साथ ही फाइटोसेनेटरी प्रमाण पत्र भी अनिवार्य है, जो कृषि एवं उद्यान विभाग के पौध संरक्षण अधिकारी की ओर से जारी होगा।
राजस्थान में संभावनाएं कम नहीं, मेवाड़ बन सकता है सहजना हब
पूर्व वन संरक्षक तथा वनस्पतियों के विशेषज्ञ डॉ. सतीश शर्मा बताते हैं कि राजस्थान में सहजना की दो प्रजातियां हैं। पहली मोरिंगा ओलिफेरा और दूसरी मोरिंगा कोनकेंसिस। पहली किस्म प्रचुर मात्रा में है, जबकि कोनकेंसिस दुर्लभ है। मेवाड़ सहित अरावली, विंध्याचल, मालवा व मारवाड़ में यह भरपूर है। सहजना, सुजना, सेंजन, मुनगा आदि नामों से पहचान रखने वाले इस पेड़ के विभिन्न भाग पोषक तत्वों से भरपूर हैं, इसलिए इनका कई प्रकार से उपयोग होता है। पत्तियों और फली की सब्जी बनती है, जबकि जड़ी-बूटियों में भी उपयोग होता है। विटामिन सी की मात्रा बहुत होती है, जो कई रोगों से लड़ता है। इसे खेती के तौर पर लगाया जा सकता है। कम जमीन होने पर किसान इसे मेड़ पर लगा सकते हैं। जून में बारिश से दो सप्ताह पहले इसकी बुवाई बेहतर है, जबकि बड़ी शाखाओं को काट पर रोपने पर भी यह फूट जाता है। किसान इसके हर भाग से भरपूर कमाई कर सकते हैं। पुणे में कई संस्थाएं इसके बीज पर काम कर रही हैं। अमूमन यह ढलान वाले स्थानों पर पाया जाता है। पानी का ज्यादा भराव होने पर यह नहीं उगता। एक बार उगने और पत्तियां झडऩे पर बसंत में यह फिर पल्लवित हो जाता है। डॉ. शर्मा के अनुसार इसकी छाल, रस, पत्तियों, बीजों, तेल और फूलों से पारम्परिक दवाइयां, कैप्सूल पाउडर आदि बनाए जाते हैं। शहर के सज्जनगढ़ अभयारण्य में इसकी दोनों प्रजातियां उपलब्ध हैं।
विदेश में भेजने वाला किसान या फर्म सहजना फली खरीदने वाली विदेशी फर्म का एग्रीमेंट, उसका मांग पत्र आदि देता है तब विभाग जांच करके यह प्रमाण पत्र जारी करता है कि उसमें किसी तरह का कोई कीड़ा या बीमारी नहीं है।
एच एस मीना, संयुक्त निदेशक कृषि (पौध संरक्षण)
Published on:
27 Nov 2017 01:02 pm
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