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स्वतंत्रता के 80 वर्ष: आज़ादी के साथ जिम्मेदारियों का बोध

उदयपुर

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Newsdesk

Aug 14, 2026

Rajasthan

दूसरा हैडिंग....स्वतंत्रता का 80वां वर्ष: उत्सव के साथ गंभीर आत्ममंथन का समय
- राजनीतिक आज़ादी के 79 वर्षों बाद मानसिक गुलामी से मुक्ति व नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग होने का समय
15 अगस्त को भारत अपनी स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। 79 वर्षों की यह स्वतंत्र यात्रा पूरी कर जब हम आज़ादी के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं तो स्वाभाविक रूप से एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है हमने स्वतंत्रता से क्या पाया और इसके साथ मिली जिम्मेदारियों को कितना समझा? आज़ादी केवल बंधनों से मुक्ति का नाम नहीं है, यह अपने साथ नागरिक उत्तरदायित्वों का बोध भी लाती है। किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है, जब उसका प्रत्येक नागरिक अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी निष्ठापूर्वक पालन करे।



1. केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं है आज़ादी
भारत आज एक स्वतंत्र राष्ट्र है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण भर नहीं हो सकता। इसका एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम मानसिक और बौद्धिक स्वतंत्रता भी है।



हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा:


क्या हम अपने इतिहास को अपनी दृष्टि से समझते हैं?


क्या हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और समृद्ध ज्ञान-परंपरा के प्रति उतना ही गौरव अनुभव करते हैं, जितना हमें करना चाहिए?


14 अगस्त को जब हम 'अखंड भारत दिवस' की अवधारणा को स्मरण करते हैं, तो इसका आशय केवल राजनीतिक सीमाओं को बदलने की आकांक्षा नहीं होना चाहिए। यह उस साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत की स्मृति है, जिसने सदियों तक इस पूरे भूभाग के समाजों को एक-दूसरे से जोड़े रखा।



नालंदा और तक्षशिला से लेकर गांधार और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारतीय ज्ञान, दर्शन और व्यापार का प्रभाव निर्विवाद रहा है। आज भले ही राजनीतिक रूप से अनेक राष्ट्र अस्तित्व में हैं, लेकिन 'भारतीय उपमहाद्वीप' की संकल्पना अपने भीतर एक साझा ऐतिहासिक-सांस्कृतिक चेतना को समेटे हुए है। भारत की आत्मा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं में नहीं, बल्कि उसकी जीवन-दृष्टि और हजारों वर्षों की विरासत में बसती है।



2. इतिहास को अपनी दृष्टि से पढ़ने की आवश्यकता

स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र को मजबूत करने, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक पहचान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। इसके बावजूद इतिहास और शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर आत्ममंथन की आवश्यकता बनी हुई है।



हमारे इतिहास का अध्ययन किसी एक कालखंड या किसी एक सत्ता के दृष्टिकोण तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारतीय इतिहास में वैदिक परंपरा से लेकर बौद्ध-जैन ज्ञान-परंपरा, मौर्य, गुप्त, मेवाड़, मराठा और असंख्य स्थानीय व जनजातीय परंपराओं की एक निरंतर धारा प्रवाहित होती है।



इतिहास का उद्देश्य न तो किसी के प्रति घृणा पैदा करना होना चाहिए और न ही किसी सत्य या गौरव को छिपाना। इतिहास का वास्तविक उद्देश्य सत्य की खोज, आत्मबोध और भविष्य के निर्माण का आधार बनना है।

हम मुगलकाल और ब्रिटिशकाल का इतिहास अवश्य पढ़ें, लेकिन उसके साथ यह भी जानें कि:


भारत की अपनी मूल ज्ञान-परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या था?


हमारे समाज ने शिक्षा और संस्कृति के केंद्र किस प्रकार विकसित किए?


किन-किन वीरों ने स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर किए?


3. युवाओं को राष्ट्रबोध और इतिहास से जोड़ना
आज भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। परंतु युवा शक्ति केवल एक संख्यात्मक आंकड़ा नहीं है, यह राष्ट्र शक्ति तब बनती है जब इसमें ज्ञान, चरित्र, आत्मविश्वास और राष्ट्रबोध का समन्वय हो।



भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, अशफाक उल्ला खां और हेमू कालाणी जैसे क्रांतिकारियों के बलिदान को केवल पाठ्यपुस्तकों के पन्नों या फ़िल्मों के दृश्यों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि उनकी गाथाएं युवाओं के भीतर यह प्रश्न जगाएं जिस देश के लिए उन्होंने अपने जीवन का बलिदान दे दिया, उस देश के प्रति आज हमारी क्या जिम्मेदारी है?


आज के युवाओं को युद्ध के मैदान में जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें अपने ज्ञान, श्रम, ईमानदारी, नवाचार और उच्च चरित्र के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।



4. भारत माता केवल एक भौगोलिक शब्द नहीं

भारत को केवल नक्शे पर बनी एक सीमा के रूप में देखना भारतीय जीवन-दृष्टि को सीमित करना है। भारत भूमि भी है, संस्कृति भी है, स्मृति भी है और चेतना भी। यह वह पावन धरा है, जिसने संपूर्ण मानवता के लिए सार्वभौमिक कल्याण की कामना की। श्रीराम की मर्यादा से लेकर श्रीकृष्ण के कर्मयोग तक, बुद्ध की करुणा से लेकर महावीर की अहिंसा तक और गुरु परंपरा से लेकर संत परंपरा तक भारत की जीवन-दृष्टि ने मनुष्य को स्वयं से ऊपर उठकर समाज और विश्व के कल्याण की प्रेरणा दी।'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' (संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएं) का भाव किसी समुदाय विशेष को श्रेष्ठ सिद्ध करने का आग्रह नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता को सदाचार और मानवीय मूल्यों की ओर ले जाने की व्यापक भारतीय आकांक्षा है।



5. मानसिक गुलामी से पूर्ण मुक्ति कब?
हमने राजनीतिक गुलामी से तो मुक्ति पा ली, परंतु क्या हम मानसिक गुलामी से भी पूरी तरह मुक्त हो पाए हैं? यह किसी पर आरोप नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का विषय है।



जब हम अपने ही ज्ञान, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और ऐतिहासिक स्मृतियों के प्रति हीनभावना महसूस करने लगते हैं, तब स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है। वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है... स्वतंत्र रूप से सोचने और प्रश्न करने की क्षमता। निष्पक्ष होकर सत्य खोजने की स्वतंत्रता। अपनी जड़ों को पहचानकर उज्ज्वल भविष्य चुनने की आजादी।



6. परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम: शिक्षा

इस सांस्कृतिक और बौद्धिक पुनर्जागरण के लिए केवल सरकारों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। सरकारें नीतियां बना सकती हैं, परंतु समाज की चेतना बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा ही है। हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा का सहज समावेश हो। विद्यार्थी न्यूटन और आइंस्टीन को पढ़ें, तो साथ ही आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक, पाणिनि और भास्कराचार्य के योगदान को भी जानें। वे विश्व इतिहास का अध्ययन करें, लेकिन महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, अहिल्याबाई होलकर, तात्या टोपे और असंख्य अज्ञात नायकों के जीवन से प्रेरणा भी लें। इतिहास के क्षितिज को बड़ा करना किसी अन्य को छोटा दिखाना नहीं, बल्कि अपने ज्ञान-बोध का विस्तार करना है।



स्वतंत्रता के अगले पड़ाव का संकल्प

स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करते हुए हमें एक नया संकल्प लेना होगा। आइए, एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहां स्वतंत्रता का अर्थ केवल अधिकारों की मांग नहीं, बल्कि कर्तव्यों का सजग निर्वहन हो। युवा अपने इतिहास पर गर्व करें और उतनी ही दृढ़ता से भविष्य की ओर कदम बढ़ाएं। आधुनिकता का तात्पर्य अपनी जड़ों से कटना न हो, बल्कि विज्ञान और तकनीक के साथ संस्कार भी आगे बढ़ें। राष्ट्रवाद का अर्थ किसी के प्रति विद्वेष नहीं, बल्कि अपने देश के प्रति समर्पण और उत्तरदायित्व हो।

भारत की स्वतंत्रता हमें विरासत में मिली है, लेकिन इसे सुरक्षित, समृद्ध और सार्थक बनाए रखना हम सभी का परम दायित्व है। 79 वर्षों की यात्रा हमें गर्व की अनुभूति कराती है; वहीं 80वां स्वतंत्रता दिवस हमें आत्ममंथन का मार्ग दिखाता है। इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल तिरंगा न फहराएं, बल्कि अपने भीतर भी राष्ट्रबोध का दीप प्रज्वलित करें। यह 80वां वर्ष केवल इतिहास का एक पड़ाव नहीं, बल्कि भारत के अगले शताब्दी-निर्माण का प्रारंभिक संकल्प है।


डॉ. प्रदीप कुमावत, शिक्षाविद, निदेशक आलोक संस्थान