उदयपुर में कृषि के क्षेत्र में फसलों पर किए जा रहे नवाचार के कारण इसकी अलग ही पहचान बन रही है। ऐसी ही पहचान राजस्थान कृषि महाविद्यालय ने भी बनाई है। जहां पर तीन प्रकार की विदेशी सब्जियां उगाकर इसे साबित किया है।
मधुसूदन शर्मा
उदयपुर. उदयपुर में कृषि के क्षेत्र में फसलों पर किए जा रहे नवाचार के कारण इसकी अलग ही पहचान बन रही है। ऐसी ही पहचान राजस्थान कृषि महाविद्यालय ने भी बनाई है। जहां पर तीन प्रकार की विदेशी सब्जियां उगाकर इसे साबित किया है। आपको बता दें कि इन सब्जियों की डिमांड उदयपुर के फाइव व सेवन स्टार होटलों में है। ये तीन सब्जियां पार्सले, सैलेरी और बासिल है। ये तीनों ही विदेशी सब्जियां औषधीय गुणों से भरपूर है। इस संबंध में वरिष्ठ सब्जी वैज्ञानिक डा.कपिल आमेटा ने बताया कि इन सब्जियों की डिमांड विदेश में ज्यादा रहती है। उदयपुर में इन सब्जियों को बाहर से मंगवाया जाता था, लेकिन अब यहां उत्पादन होने से ये उदयपुर के होटलों में भी भेजी जा रही है। यहां के स्थानीय वैंडर्स महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध राजस्थान कृषि महाविद्यालय से सौ से डेढ़ सौ रुपए किलो में ले जाते हैं और तीन सौ से चार सौ रुपए किलो तक विक्रय कर रहे हैं। इसमें खास बात ये है कि इन तीनों को जैविक खाद से तैयार किया है। सेलेरी का वैज्ञानिक नाम एपियम ग्रेवेलैन्स, पार्सले का वैज्ञानिक नाम पैट्रौसैलीनम क्रिस्पम, थाई बैसील का वैज्ञानिक नाम ओसीमम बासीलीकम है।
आप भी जाने इन सब्जियों के बारे में
पार्सले: घर में बन रही सब्जी का स्वाद बढ़ाने के लिए धनिये की तरह उपयोग िकया जाता है। विदेशों में इसको नॉनवेज में डाला जाता है। उदयपुर में फाइव व सेवन स्टार में 15 से 20 किलो के हिसाब से प्रतिदिन जाती है। इसकी कीमत सौ रुपए से चार सौ रुपए प्रति किलो तक है। इसकी खेती सर्दी में की जाती है और खुले में सितंबर से मार्च तक कर सकता है। पॉली हाउस में सालभर खेती की जा सकती है। इसकी पत्तियां धनिये की तरह होती है।
सैलेरी: इसकी पत्ती का शूप बनता है। ये एंटीक कैंसर है। सैलेरी की पत्ती का सेवन करने से कैंसर कम होता है। यही नहीं इसका उपयोग पांच व सात सितारा होटलों में सलाद में भी किया जाता है। इसके डंठल की बाजार में मांग रहती है। ये सर्दी की फसल है। पॉली हाउस में सालभर उगाया जा सकता है। इसकी कीमत सौ से दौ सौ रूपए किलो तक है। इसको बार-बार लगाने की जरूरत नहीं है। एक बार लगाने पर दो से तीन साल तक चलती है। सभी जैविक खाद से तैयार की गई है। खेत में ढाई से तीन माह में इसकी फसल तैयार हो जाती है।
थाई बासिल: बाजार में इसकी मांग है। इसकी पत्तियों की कीमत सौ से दौ सौ रूपए किलो है। इसका उपयोग सलाद, शूप, पीजा, पास्ता में किया जाता है। इसके अलावा फास्टफूड में भी इसका उपयोग होता है। इसकी उदयपुर के होटलों में प्रतिदिन की डिमांड 40 किलो के आस-पास रहती है। पहले इनको गुजरात, दिल्ली, हिमाचलप्रदेश से मंगवाया जाता है।