यशवंत पटेल/अनिल वैष्णव
खेरवाड़ा/परसाद. गर्मी की शुरुआत के साथ उदयपुर जिले के आदिवासी क्षेत्र के जंगल महुए की मदहोश खुशबू से महकने लगे हैं। महुए के पेड़ आमदनी का बड़ा जरिया है, इसलिए इन पेड़ों को आदिवासी परिवार का हिस्सा मानते हैं और पारिवारिक सदस्यों के तरह ही लालन पालन करते हैं। हालांकि दिनों दिन अवैध कटाई के चलते पेड़ों की कमी होती जा रही है।
आदिवासी बाहुल्य अंचल नयागांव, खेरवाड़ा, ऋषभदेव, सराडा़, सेमारी, सलूम्बर क्षेत्रों में महुए का महत्व अभी भी है। इस क्षेत्र में आदिवासियों के साथ खेती से जुड़े अन्य वर्ग भी महुए के पेड को जायदाद का हिस्सा मानते हैं। पैतृक सम्पति के बंटवारे के दौरान महुए के पेड़ों का भी बंटवारा किया जाता है।
क्षेत्र में वर्तमान में हर ओर महुए के फूलों की भीनी महक वातावरण को मदहोश कर रही है। चैत्र मास के आरंभ होने के साथ महुए के फूल पक कर गिरने शुरू हो गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार के सदस्य सुबह से ही पेड़ से गिरे पके हुए महुए के फूलों को चुनकर एकत्रित करना शुरू कर देते हैं। एकत्र किए फूलों को घर लाकर साफ जगह पर सुखा लिया जाता है। कई लोग भण्डारण करते हैं तो कई बेच कर नकदी लेते हैं।
महुआ एक भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तरभारत के मैदानी और वन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम मधुका लोगफोलिया है। यह तेजी से बढऩे वाला वृक्ष है जो बीस मीटर लम्बाई तक जा सकता है। इसके पत्ते आमतौर पर वर्ष भर हरे रहते हैं। आदिवासी समाज सूखे फूलों से चोरी छुपे हथकढ़ शराब बनाते हैं। मीठे महुए के सूखे फूलों से सर्दी में लोग तिल व गुड मिलाकर लड्डू बनाकर व आग पर सेक कर मेवे की तरह खाने में भी उपयोग करते हैं। इसके पौष्टिक गुणों से शरीर को ताकत मिलती है। बच्चों को न्यूमोनिया होने पर फूल उबाल कर पानी को घुट्टी के रूप में पिलाया जाता है। वहीं पानी में हल्दी डालकर सर्दी-खांसी में कफ सीरप के रूप में पिलाया जाता है।
दो सौ वर्ष तक आय, होता है परम्परागत हक
महुए के पेड़ से लोगों को अतिरिक्त आय होती है। ऐसे में महुए के पेड़ को नहीं काटा जाता है। इसके साथ ही इन पेड़ों पर आदिवासी समुदाय का परम्परागत हक भी होता है। इस पेड़ को परिवार का हिस्सा मानते है। महुआ की छाल का इस्तेमाल बलगम खांसी, ब्रोंकाइटिस, डायबिटीज, मेलिटस और ब्लीडिंग में किया जाता है। गठिया और बवासीर की दवाई के रूप में महुआ की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी जड़ सूजन, दस्त और बुखार में बहुत असरकारक होती है। खास बात ये हैं महुआ बहुत लंबे समय तक सुखा कर स्टोर किया जा सकता है। एक बार जब ये सूख जाता है तो सालों तक इसका प्रयोग किया जा सकता है।
नहीं काटते महुए के पेड़
जंगल और खेतों की मेड़ आदि स्थानों पर लगे महुए के पेड़ से वर्षों तक होने वाली आय को देखते हुए लोगों को काफी मोह है। इसी कारण महुए के पेड़ को नहीं काटा जाता है। वन विभाग में महुए पौधों की मांग भी अधिक रहती है।
डायबिटीज में होता है अमृत
जानकारों के अनुसार डायबिटीज बीमारी में महुए की छाल अमृत की तरह काम करती है। हालांकि महुआ के फूल का प्रयोग डायबिटीज रोगियों को नहीं करना होता है।
फल भी उपयोगी
फूल के बाद फल पकता है जो डोलमा कहा जाता है। इस डोलमे से तेल निकाला जाता है। जो साबुन व अन्य काम में लिया जाता है। हालांकि आदिवासी इलाके में इस तेल को खाद्य तेल के रूप में काम में लिया जाता है। इस तेल से कई प्रकार की औषधियों में भी काम में लिया जाता है।
पशुचारा और पत्तल-दौना
महुए के पत्ते भी पशुओं के चारे के रुप में उपयोग लिये जाते है। साथ ही इनसे पत्तल-दौने भी बनाए जाते हैं। इससे कई लोगों को रोजगार मिलता है।
दर्द निवारक दवा है। अनिद्रा में भी औषधि का काम करता है। वहीं पौष्टिक व ताकतवर होने के साथ खांसी, जुकाम आदि में इसके फूलों को उबाल कर पानी से राहत मिलती है। महुए के पेड़ की छाल डायबिटिज में काम करती है।
शोभाराम औदिच्य, आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी, उदयपुर