उदयपुर शहर के संस्थापक महाराणा उदय सिंह की राणेराव तालाब पर बनी छतरियों का जीर्णोद्धार हो रहा है। जिससे से छतरियां निखर उठी हैं। छतरियों के अलावा यहां अन्य सात छतरियों के संरक्षण का कार्य चल रहा है। जीर्णशीर्ण हो चुकी छतरियों का कायाकल्प होकर ये पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होगा।
छतरियों का जीर्णोद्धार कर संरक्षित करने के साथ ही छतरी से लेकर तालाब पाल तक घाट का निर्माण, चार दिवारी व बच्चों के खेलकूद व मनोरंजन के लिए पार्क का निर्माण किया जाएगा। वहीं पास राणेराव तालाब के सौंदर्यीकरण के तहत मिनी फतहसागर की तर्ज पर छतरियों का निर्माण किया गया है।
दिखने लगी पहचान
छतरियों के जीर्णोद्धार के तहत जब उनसे जमी मिट्टी को केमिकल ट्रीटमेंट के द्वारा साफ किया गया तो छतरियों पर लुप्त हो चुके नाम, संवत फिर से दिखाई देने लगे। जिससे सभी छतरियों कि पहचान हो गई। पाल पर कुल 17 छतरियां हैं, जिसमें महाराणा उदय सिंह के अलावा महाराण खेता व अन्य राज राणा की हैं। सभी छतरियों को एक दूसरे से जोडऩे के लिए पाथ-वे बनाया जा रहा है। जिससे ये सभी आपस में जुड़़ जाएगी।
इस तरह बढे कदम
महाराणा उदय सिंह की छतरियों के संरक्षण व तालाब सौंदर्यीकरण के लिए उपजिला प्रमुख पुष्कर तेली ने प्रधान रहते हुए इन स्थलों को केंद्र सरकार की डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन योजना में शामिल करवा राशि स्वीकृत करवाई। छतरियों के संरक्षण के लिए 30 लाख की राशि व तालाब संरक्षण के लिए 20 लाख की राशि स्वीकृत हुई।
होती रही उपेक्षा
कस्बा महाराणा प्रताप की राजतिलक स्थली होने के साथ ही महाराणा प्रताप की कर्मस्थली भी रहा है, परन्तु पर्यटक स्थली के रूप में यह विकसित नहीं हो सका। गोगुंदा हल्दीघाटी-कुंभलगढ़ के नजदीक होते हुए भी इसके सर्किट में नहीं जुड पा रहा है।