
मीरा के वस्तुपरक मूल्यांकन के प्रयास हो -प्रो. शेखावत
उदयपुर . जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के मीरा पीठ की ओर से शुक्रवार को लोकमान्य तिलक शिक्षक महाविद्यालय में मीरा के पदों में भाषागत संगीतिकी वैशिष्ट्य विषय पर एक दिवसीय व्याख्यान में मुख्य अतिथि जेएनवी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. लोकेश कुमार शेखावत ने कहा की मीरा ने अपने समर्पण भाव से कण-कण को अपनी भक्ति भावना से सींच दिया। निश्चय ही मीरा अपने युग की एक विशिष्ठ सृजनधर्मी किरण थी। मीरा के अलौकिक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने के साथ ही उनके भजनों को मन्दिरों में गाए जाने की परम्परा को पुर्नजीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की भक्ति शक्ति और बलिदान का प्रतिक मेवाड़ में महाराणा प्रतापए मीरा बाई तथा पन्नाधाय हुई है। मुख्य वक्ता प्रयाग संगीत समिति की डॉ. मधुरानी शुक्ला ने कहा की मीरा के पदों गीतों में ही संगीत विद्यमान है। इस संगीत में स्वयं दर्शन मौजूद है। वह दर्शन मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है। मीराबाई वर्तमान समय में अर्थवान और प्रासंगिक कवयित्री है गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के पुरूषार्थ रूप का चित्रण कर जनमानस को उनके जीवन का आदर्श बना दिया तो मीरा ने अपने समर्पण भक्ति व्रत नृत्य कर उमड़ता था, जिसने लोक रंजक छविया उकेर कर जन जीवन को विश्वास और आस्था का प्रतीक बनाया। मीरा के पदों में भाषा की सरलता और शब्दों की सादगी का उल्लेख करते हुए कहा कि इन शब्दों का सहज ही लोक प्रचलित हो जाना यह सिद्ध करता है कि व्याकरण से भाषा नहीं बल्कि भाषा से व्याकरण बनती है। कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि अगर हमें भक्ति का मार्ग अपनाना है तो अपने सभी बंधनो से मुक्त होना होगा। जब तक हम इन बंधनों से जुड़े रहेंगे तब तक हम न तो भक्तिकर सकते, न किसी की भलाई कर सकते और न सफल हो सकते है। वर्तमान दौर में महिलाओं को सफल होना है तो मीरा के व्यक्तिव एवं कृतित्व को जानना होगाए मीरा बाई ने जिस तरह चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ी उसे सीख लेनी चाहिए। अध्यक्षता करते हुए मीरा अध्ययन एवं शोध पीठ के मानद निदेशक प्रो. कल्याणसिंह शेखावत ने कहा कि मीरा सम्पूर्ण भारतीय जन की आस्था एवं श्रद्धा की प्रतीक है। मीरा सम्पूर्ण नारी समाज का गौरव है। मीरा पावन गंगा के समान है। मीरा वेदना की प्रतिमूर्ति तथा लोक कल्याण की सर्वोच्च भावनाओं से ओतप्रोत है। मीरा की साहित्यिक, संस्कृति आज भी सभी के लिए प्रेरणादायी है। डॉ. शशि चित्तौड़ा, नई दिल्ली के वरिष्ठ एडवोकेट डॉ. सुशील कुमार सतवारा, डॉ. सुशील कुमार गुप्ता तथा मीरा शोध संस्थान की प्रभारी रीना मेनारिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन डॉ. हरीश चौबीसा ने किया। धन्यवाद प्रो. कल्याण सिंह शेखावत ने दिया। व्याख्यान में एमएड, बीएड, एसटीसी के विद्यार्थी मौजूद थे।
Published on:
09 Nov 2019 02:22 am
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