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सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग पर खर्च को जरूरी नहीं मानते पेरेंटस

एमपीयूएटी की शोधार्थी ने आत्मरक्षा पर बनाया टूलकिट, नेशनल साइकोलॉजिकल कॉर्पोरेशन आगरा ने किया प्रकाशित

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Self Defence Training

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली बालिकाओं में आत्मरक्षा को लेकर समझ का स्तर औसत है। लेकिन जितनी उन्हें समझ है, उसे खुद की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करने में वे निपुण हैं। हालांकि आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं होने से ज्यादातर बालिकाओं के माता-पिता सेल्फ डिफेंस के लिए अलग से प्रशिक्षण को जरूरी नहीं मानते। यह तथ्य उदयपुर शहर की सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली 12 से 14 वर्ष उम्र की 350 बालिकाओं पर हुए अध्ययन में सामने आए हैं।

कट्टक, ओडिशा निवासी शोधार्थी प्रग्न्या प्रियदर्शिनी पांडा ने महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के सामुदायिक एवं व्यवहार विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गायत्री तिवारी के निर्देशन में आत्मरक्षा का टूलकिट विकसित किया है। जिसे इस अध्ययन में इस्तेमाल गया। देशभर की बालिकाओं के लिए उपयोगी मानते हुए नेशनल साइकोलॉजिकल कार्पोरेशन आगरा ने भी इसे प्रकाशित किया है।

जागरूकता और अभ्यास का स्तर जाना

शोधार्थी प्रग्न्या ने उदयपुर शहर में चार सरकारी विद्यालयों की कक्षा छह, सात व आठवीं की बालिकाओं में आत्मरक्षा को लेकर जागरूकता और अभ्यास के स्तर का अध्ययन किया। शारीरिक, मनोसामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर उन्होंने इन बातों का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि 76.29 प्रतिशत बालिकाओं में आत्मरक्षा को लेकर जागरूकता का स्तर औसत है। वहीं 15.42 प्रतिशत में इसकी अच्छी समझ है। जबकि 8.28 प्रतिशत में समझ का स्तर कमजोर है। लेकिन जितनी समझ उन्हें अपनी माताओं अथवा परिवार से मिली है, 48.28 प्रतिशत बालिकाएं उनका बेहतर यानी समझदारी पूर्वक इस्तेमाल करती है। जबकि 39.42 प्रतिशत छात्राएं आत्मरक्षा तकनीकों का औसत इस्तेमाल कर पाती है। जबकि 12.28 प्रतिशत बेटियां इसमें कमजोर हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि आर्थिक स्तर कमजोर होने से ज्यादातर परिवार अपनी बेटियों को अलग से आत्मरक्षा का प्रशिक्षक दिलवाना वहन नहीं कर पाते।

अध्ययन का देशव्यापी उपयोग

इस अध्ययन के दौरान विकसित किए गए टूलकिट को जहां नेशनल साइकोलॉजिकल कॉर्पोरेशन की ओर प्रकाशित किया गया है। वहीं इसके तहत शिक्षकों और माता पिता के लिए भी एक गाइड बुक तैयार की गई है। जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से देश 13 राज्यों में प्रकाशित कर वितरित किया जा रहा है।

आत्मरक्षा की समझ

- 76.29 प्रतिशत में औसत

- 15.42 प्रतिशत में बेहतर

- 8.28 प्रतिशत में कमजोर

आत्मरक्षा तकनीक के प्रयोग में

- 48.28 प्रतिशत में बेहतर

- 39.42 प्रतिशत में औसत

- 12.28 प्रतिशत में कमजोर

इनका कहना ...

मौजूदा दौर में बालिकाओं में आत्मरक्षा की समझ बहुत जरूरी है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि वे आवश्यकता पड़ने पर इसकी तकनीक का कितना बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं। इसी उद्देश्य से यह शोध किया गया है। इसमें विकसित टूल किट को नेशनल साइकोलॉजिकल कॉर्पोरेशन आगरा ने प्रकाशित किया है। यह बड़ी बात है। शोध के बाद शिक्षकों और माता के लिए भी एक गाइड बुक तैयार की गई है। जो बेटियों को आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाने में मददगार होगी।

- डाॅ. गायत्री तिवारी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सामुदायिक एवं व्यवहार विज्ञान महाविद्यालय, एमपीयूएटी, उदयपुर