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उदयपुर : निकाय चुनाव से पहले छात्रसंघ चुनाव पर असमंजस, युवा आंदोलन से सरकार की बढ़ी चुनौती

राजस्थान में तीन साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं होने से छात्रों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और विश्वविद्यालयों में आंदोलन तेज हो गए हैं।
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छात्रसंघ चुनाव

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उदयपुर. पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं के बढ़ते विरोध के बीच अब राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा भी सरकार के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तीन वर्षों से छात्रसंघ चुनाव नहीं होने से छात्रों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। राजस्थान विश्वविद्यालय सहित कई शिक्षण संस्थानों में धरना, प्रदर्शन और अनशन जारी हैं। दूसरी ओर सितंबर से निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार निकाय चुनाव से पहले छात्रसंघ चुनाव कराएगी या एक बार फिर इन्हें टाल दिया जाएगा। इसी असमंजस ने कैंपस की राजनीति को फिर गर्मा दिया है।

राजस्थान में आखिरी बार वर्ष 2022 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इसके बाद लगातार तीन वर्षों से चुनाव नहीं कराए गए। इस दौरान विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले हजारों विद्यार्थियों को अब तक एक भी छात्रसंघ चुनाव में मतदान का अवसर नहीं मिला। छात्र संगठनों का कहना है कि छात्रसंघ केवल राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की समस्याओं को उठाने और लोकतांत्रिक नेतृत्व तैयार करने का माध्यम है। इसके बावजूद सरकार की ओर से अब तक चुनाव को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया गया है।

राजस्थान विश्वविद्यालय आंदोलन का केंद्र

राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर आंदोलन लगातार तेज हो रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में पिछले 16 दिनों से छात्र धरने पर बैठे हैं, जबकि छात्रनेता शुभम रेवाड़ सात दिनों से आमरण अनशन पर हैं। इसके अलावा प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों और सरकारी महाविद्यालयों में भी विभिन्न छात्र संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। छात्रों का कहना है कि यदि स्थानीय निकाय और अन्य लोकतांत्रिक चुनाव समय पर हो सकते हैं तो छात्रसंघ चुनाव लगातार टालने का कोई औचित्य नहीं है।

निकाय चुनाव से पहले सरकार की बढ़ी चुनौती

सरकार के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर चुनौती है। सितंबर में निकाय चुनाव प्रस्तावित हैं और उसकी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यदि इससे पहले छात्रसंघ चुनाव कराए जाते हैं तो विश्वविद्यालय परिसर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन सकते हैं, जिसका असर निकाय चुनाव के माहौल पर भी पड़ सकता है। वहीं यदि चुनाव नहीं कराए गए तो पहले से पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं को लेकर नाराज युवाओं का असंतोष और बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के लिए दोनों परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण मानी जा रही हैं।

चुनाव नहीं, फिर भी हर साल वसूली

छात्र संगठनों का एक बड़ा सवाल छात्रसंघ शुल्क को लेकर भी है। उनका कहना है कि छात्रसंघ चुनाव नहीं होने के बावजूद राजस्थान विश्वविद्यालय सहित राज्य के विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों में प्रवेश के दौरान विद्यार्थियों से 50 से 100 रुपए तक छात्रसंघ मद में शुल्क लिया जा रहा है। छात्र नेताओं का दावा है कि पूरे प्रदेश में हर साल इस मद में करोड़ों रुपए की वसूली होती है, जबकि चुनाव आयोजित नहीं किए जाते। छात्र संगठन इस राशि के उपयोग और पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

क्या कहते हैं छात्र संगठन

छात्रसंघ चुनाव छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है। समझ नहीं आता कि सरकार चुनाव कराने से क्यों डर रही है। निकाय चुनाव और छात्रसंघ चुनाव का कोई सीधा संबंध नहीं है। यह पूरी तरह कैंपस का चुनाव है। यदि जल्द घोषणा नहीं हुई तो एनएसयूआई प्रदेशभर में बड़ा आंदोलन करेगी।

विनोद जाखड़, राष्ट्रीय अध्यक्ष, एनएसयूआई

हम लगातार छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव कराए जाने चाहिए। यदि सरकार कार्यक्रम घोषित नहीं करती है तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

भारत भूषण, राष्ट्रीय संयोजक, एबीवीपी (राजकीय महाविद्यालय)