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ऐसी जाति, जिसने बैलगाडिय़ों में घूमकर पूरे मेवाड़ में प्रताप की सेना के लिए बनाए हथियार

गाडिय़ा लोहार अब सरकारी पक्के घरों में रहते हैं, लेकिन धमनियों में दौड़ता है प्रताप के स्वाधीनता संकल्प का जज्बा

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जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. गाडिय़ा लोहार...। एक ऐसी जाति, जिसकी जीवनशैली ही सदियों तक पहियों पर चलती गाडिय़ों के ईर्द-गिर्द घूमती रही। इसलिए वे गाडिय़ा लोहार कहलाए। लोहारी (लोहे के अस्त्र-शस्त्र बनाना) उनका खानदानी कार्य था, लेकिन हल्दीघाटी युद्ध के दौर ने इस जाति को जननायक प्रताप और मेवाड़ के प्रति समर्पण और मातृभूमि की रक्षा में अपने योगदान के लिए इतिहास में बड़ा नाम दिलाया।
इतिहासकार प्रो. जीएल मेनारिया और डॉ. अजातशुत्र बताते हैं कि स्वाधीनता और गहरे देशप्रेम में डूबे होने से गाडोलिया लोहारों ने यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक चित्तौडग़ढ़ को शत्रुओं के नियंत्रण से मुक्त नहीं करा लेंगे, तब तक वे कभी भी चित्तौड़ में प्रवेश नहीं करेंगे। यह दृढ़ प्रतिज्ञा लेकर गाडोलिया लोहारों ने राजपूत सामंतो के साथ ब्राह्मण, वैश्य, भील-मीणा जैसे आदिवासी जातियां भी प्रताप के साथ निरंतर मुगल विरोधी आक्रमण में लड़ी और अपने अल योद्धा जमातियों के साथ वीरगति भी प्राप्त की। युद्ध एवं संकट के समय शस्त्र निर्माण व रसद की आपूर्ति से जुड़ी जातियों में गाडोलिया लोहार एवं बंजारों की अहम भूमिका थी। मेवाड़ की प्रमुख नदी बनास के तट पर बसी बंजारों की अहम भूमिका थी। रेलमगरा (राजसमंद) एवं बनास तट पर बसी बंजारा जातियों द्वारा माल-असबाव की समय पर आपूर्ति ये लोग अपने बैलों, घोड़ा, गधे, खच्चर इत्यादि पशुओं की मदद से करते थे। यातायात का काम करने वाले युद्ध में ये गाडोलिया लोहार प्रताप के सैन्य शिविरों एवं युद्धस्थलों में व मोही, नाथद्वारा, ताना, खमनोर, गोगुंदा के लोहार बैलगाड़ी में बैठकर पूरे मेवाड़ में परिवार सहित घूमते रहते थे और शस्त्र निर्माण एवं उनके दुरुस्तीकरण का काम करते थे। जंग के लिए नए हथियारों का निर्माण और पुराने शस्त्रों को ठीक करने के काम के चलते इस जाति के लोग मेवाड़ में स्वाधीनता के संघर्ष में बड़े सहयोगी तो रहे, बाद में इन्होंने पलायन किया। गाडोलिया लोहार की बही जिक्र है कि जो परिवार पंजाब चले गए वे पंजाबी लोहार, गुजरात जाने वाले गुजराती लोहार, मालवा में मालवीय लोहार और मेवाड़ में गाडोलिया लोहार कहलाए।
- गांव बसाने के लिए बुलाया था नेहरू को
प्रताप के शासनकाल में लिए प्रण के कारण सदियों तक घुमक्कड़ जीवन जीते रहे गाडिय़ा लोहारों को सन् 1952 में चित्तौड़ के तत्कालीन सांसद उदयलाल बोहरा ने वहां एक गांव बसाया, ताकि उन्हें घुमंतू जीवन-यापन न करना पड़े। इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बुलाकर गांव का उद्घाटन करवाया गया। अंग्रेजों से आजादी के बाद व्यवस्थाएं और हालात बदले, लेकिन गाडिय़ा लोहारों ने अपनी जीवनशैली को ज्यादा नहीं बदला। आज भी सरका की ओर से देय कुछ सुविधाओं के साथ वे पुश्तैनी काम से ही गुजर-बसर कर रहे हैं। उनके सरकारी पक्के घरों के बाहर बैलगाडिय़ां खड़ी मिल जाएंगी। वे आज भी औजार निर्माण कार्य में ही जुटे हैं।
- इन जातियों का भी रहा योगदान
एशिया के सबसे शक्तिशाली मुगल सम्राट अकबर को चुनौती देने में प्रताप के हाथ मजबूत करने के लिए ब्राह्मण वर्ग, विशेषकर पंचगौड़ और पंचद्रविड़, पानेरी, पालीवाल, नागदा, मेनारिया, भट्टमेवाड़ा, गुर्जरगौड़ व राजपूतों की समस्त शाखा के योद्धाओं चूंडावत के उच्च आदर्श चौहान, देवड़ा, झाला, राठौड़, सोलंकी व वैश्य, भील, माली, तेली, कायस्थ, मीणा, मांगलिया, गरासिया आदि जातियों ने अपना योगदान दिया। प्रताप ने स्वतंत्रता और स्वाभिमान, देश, धर्म एवं संस्कृति के उदात्त मूल्यों पर इन्हीं जातियों की मदद से अकबर के विरुद्ध 25 साल तक लगातार संघर्ष किया।

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