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राजस्थान में वनस्पतियों की तीन नई प्रजातियों की खोज

सर्वाधिक महत्वपूर्ण जंगली केले की म्यूसा रोजेसिया प्रजाति

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राजस्थान में वनस्पतियों की तीन नई प्रजातियों की खोज

राजस्थान में वनस्पतियों की तीन नई प्रजातियों की खोज

उदयपुर. हाल ही में राजस्थान के वनों की जैव विविधता के अध्ययन के दौरान वनस्पतियों की तीन नई प्रजातियों की प्रथम उपस्थिति दर्ज की गई है। इस खोज में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जंगली केले की म्यूसा रोजेसिया प्रजाति की भी है। सेवानिवृत्त वन अधिकारी डॉ. सतीश कुमार शर्मा एवं टाइगर वाच संस्था सवाईमाधोपुर के क्षेत्र जीव विज्ञानी डॉ. धमेन्द्र खाण्डल ने केले की यह नई प्रजाति सीतामाता अभयारण्य में बुलबुला महादेव, ढेबर शिला एवं वाल्मिक आश्रम मे खोजी है। डॉ. शर्मा बताते हैं कि इस प्रजाति के केले में फल की लम्बाई मात्र 6 से 8 सेमी. तक होती है, इसमें खुरदरी दानेदार सतह वाले काले बीज भरे रहते हैं, इसमें गूदा नहीं के बराबर होता है। यह केला भूमिगत भागों की मदद से बढ़वार कर झुण्ड बना लेता है तथा सुरक्षा मिलने पर निरन्तर जीवित बना रहता है तथा हर साल फल पैदा करता है। डॉ. सतीश बताते हैं कि म्यूसा रोजेसिया प्रजाति के केले को खोजे जाने से पूर्व फुलवारी की नाल अभयारण्य मे एक और जंगली केले एनसेट सुपरबम का पता चल चुका है, जिसका पश्चिमी भारत मे सबसे अधिक घनत्व ओगणा, कोटड़ा एवं देवला के वनों में लादन वन क्षेत्र एवं आस पास ज्ञात हुआ है। अनुमान है कि यहां इस प्रजाति के जंगली केलों के पौधों की संख्या लाखों में है। जंगली केले के अलावा दोनों ने रणथम्भौर बाघ परियोजना के करौंजी के नाला में एन्टीडैस्मा घिसेमबिला नामक वृक्ष की खोज की है। यह पौधा मध्य भारत में जगह-जगह पाया जाता है, जहां इसे खटुआ नाम से जाना जाता है। इस पौधे के फल छोटे-छोटे गुच्छों में लगते हैं, जो पकने पर लाल-जामुनी हो जाते हैं। इस प्रजाति के वृक्ष की पत्तियां गोंदे की पत्तियों जैसी प्रतीत होती हैं। हाडौती क्षेत्र के बारां जिले की शाहबाद रेंज के कुण्डाखोह क्षेत्र मे एरीथिना सुबरोसा बुबलोबाटा नामक वृक्ष की खोज भी नई है। यह वृक्ष भी मध्य भारत की प्रजाति है। एन्टीडैस्मा घिसेमबिला तथा रीथिना सुबरोसा बुबलोबाटा दोनों वृक्ष प्रजातियां भी राजस्थान के फ्लोरा में प्रथम बार शामिल हुई हैं। डॉ. शर्मा ने बताया कि राजस्थान के लिए इन नए पौधों का रिकॉर्ड हाल ही मे अनुसंधान जर्नल इंडियन जर्नल ऑफ एन्वायरमेन्टल साइन्स के अंक 23 (2) में प्रकाशित हुआ है।