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उदयपुर में यूं हुआ 272 भूखंडों का घोटाला, भूमिदलालों ने लगाई करोड़ों की चपत

उदयपुर में यूं हुआ 272 भूखंडों का घोटाला, भूमिदलालों ने लगाई करोड़ों की चपत
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मोहम्मद इलियास/उदयपुर.
यूआईटी से हस्तांतरित हुई कॉलोनियों में खाली पड़े भूखंडों को नगर निगम द्वारा खुदबुर्द का मामला उजागर होने के बाद परत-दर-परत जांच में नित्य नए खुलासे हो रहे है। गड़बड़झाले में ऐसे-ऐसे भूखंड भी सामने आ रहे है जिनमें बरसों पुरानी बेकडेट के यूआईटी में आवंटन पत्र के आधार पर निगम में नामांतरण खोले गए। आवंटन पत्रों की जांच हुई तो संबंधित व्यक्ति का अता पता ही नहीं मिला। यूआईटी में उनकी जमा राशि की रसीद नहीं होने पर निगम ने अब तक करोड़ों का एक भूखंड को निरस्त किया तथा अन्य की जांच चल रही है। कुछ मामलों में यूआईटी से फाइलें आधी अधूरी से कॉलोनियों की सर्वे में भी दिक्कतें आ रही है। अब तक सेक्टर-3 के सर्वे में टीम को 19 भूखंड खाली मिले है। निगम ने उन पर कब्जा किया तभी 3 जने सामने आ गए। निगम ने कब्जेदारों से रिकॉर्ड मांगें है। इधर, सेक्टर-11 में भूखंड संख्या 746 के कब्जे में मामले में न्यायालय ने परिवादी का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया। इधर, यूआईटी व नगर निगम के बीच अभी 272 खाली भूखंडों को पेच फंस रहा है, भूखंडों की संख्या को अभी कोई स्पष्ट नहीं कर पा रहा। यह संख्या अगर सही है तो भूखंडों की लोकेशन व कीमत के आधार पर यह घोटाला करीब 500 करोड़ के पार जाएगा।
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घोटाले की ऐसी पराकाष्ठा
केस-1
यूआइटी की सूची में सेक्टर-8 का भूखंड संख्या-1 गायब यूआटी से हस्तांतरण में हुई सेक्टर-8 की कॉलोनी में भूखंड संख्या-1 गायब था। उस भूखंड की फाइल ही निगम में नहीं आई। निगम के अधिकारियों के अनुसार 5400 स्कवायर फीट इस भूखंड पर राजेन्द्र धाकड़ ने सम्पत्ति का बोर्ड लगा रखा था और आधा भूखंड किसी और को बेच दिया था। जांच में इस भूखंड का यूआईटी से 26 मई 1982 का मंडी की नाल निवासी गणेशलाल पुत्र नवलाजी तेली का आवंटन पत्र मिला। इसमें 90 रुपए प्रति वर्ग गज की दर से भूखंड आवंटन बताया। गणेशलाल को 50835 रुपए में भूखंड आवंटित किया गया निगम का कहना है कि इस जमा राशि की किसी के पास रसीद नहीं है और पता भी गलत सामने आया है। निगम ने जांच के बाद इस भूखंड का नामांतरण निरस्त कर दिया।
सवाल- नामांतरण खोलते समय निगम के अधिकारियों व कर्मचारियों ने आवंटन पत्र की जांच क्यों नहीं की। निगम के पास भूखंड आने के बाद यह सूची में क्यों नहीं शामिल किया गया। 1982 के बाद अभी इसका नामांतरण संदेह के घेरे में है। यूआईटी से सूची में इस भूखंड का उल्लेख नहीं था तो इसकी फाइल के पड़ताल क्यों नहीं की गई।
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केस-2
सेक्टर-3 में मिले खाली भूखंड, तीन कब्जेदार आए सामने यूआईटी की सूची से मिलान करते हुए नगर निगम की टीम ने सेक्टर-3 कॉलोनी का दो दिन सर्वे किया। सर्वे में टीम को 19 भूखंड खाली मिले। इन भूखंडों की जांच के लिए निगम ने इन्हें अपने कब्जे में लिए। निगम के पास तीन कब्जेदार उसी समय सामने आ गए। निगम ने उनसे रिकॉर्ड मंगवाया। इसी तरह अन्य कब्जेदारों से भी रिकॉर्ड तलब किए जा रहे है। निगम इसके बाद हिरणमगरी की अन्य कॉलोनी का सर्वे करेगी। ---
केस-3
भूखंड संख्या-746 के कब्जेदार पहुंचे कोर्ट, अंतरित प्रार्थना पत्र खारिज
सेक्टर-11 में भूखंड संख्या-746 का कब्जेदार न्यायालय में पहुंचे। कब्जेदार नरेन्द्र जैन ने नगर निगम के खिलाफ दावा व अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पेश किया जिसमें उसने निगम द्वारा भूखंंड पर कब्जा व नीलाम नहीं करने की मांग की। निगम के अधिवक्ता भूपेन्द्र कुमार जैन ने पक्ष रखते हुए एक दिन पहले मामले में यूआईटी को भी पक्षकार बनाने के लिए नियम-10 आदेश-1 के तहत प्रार्थना पत्र पेश किया। न्यायालय ने उसे स्वीकार कर लिया। दूसरे दिन गुरुवार को अधिवक्ता जैन ने आदेश-7 नियम-11 के तहत न्यायालय के क्षेत्राधिकार में नहीं आना बताकर प्रार्थना पत्र पेश किया वहीं व डीटीपी नीलम वर्मा ने दस्तावेज पेश कर पक्ष रखा। न्यायालय ने इस पर सुनवाई 23 फरवरी नीयत की तथा मामले की अंतरिम अस्थाई निषेधाज्ञा के प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया।
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जिन भूखंडों पर हुए कब्जे, अधिकांश बिक गए
यूआईटी ने करीब 10 साल पहले निगम को कुछ कॉलोनियां हस्तातंरित की थी। इन कॉलोनियों मेंं कई भूखंड खाली थे। नीलामी के चलते अधिकांश भूखंड कॉर्नर के थे। पूर्व में निगम ने इन भूखंडों पर स्वयं की सम्पत्ति के बोर्ड भी लगाए लेकिन इसकी सारसंभाल नहीं करने से भूमिदलालों ने कब्जे कर लिए। कइयों के फर्जी दस्तावेज भी बन गए है और उनके नाम से नामांतरण भी खुल गए। कुछ भूखंडों को दलालों ने बेच भी दिया। राजस्थान पत्रिका ने इस फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए 25 नवम्बर के अंक में ‘निगम नहीं संभाल पाई सम्पत्तियां, यूआईटी से मिले खाली भूखंडों पर हो गया कब्जा’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की तो हडकंप मच गया। खबर में हिरणमगरी, गोवद्र्धनविलास में करोड़ों रुपए कब्जा होने का उल्लेख किया था।