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उदयपुर : झीलों की नगरी पर ‘ओवरटूरिज्म’ का बोझ; अंधाधुंध कट रहे पहाड़, पानी में घुल रहा प्रदूषण

उदयपुर में बढ़ते ओवरटूरिज्म के कारण झीलों, पहाड़ियों, भूजल और वन्यजीवों पर दबाव बढ़ने से प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट गहरा रहा है। विशेषज्ञों ने वहन क्षमता तय करने और सस्टेनेबल टूरिज्म मॉडल अपनाने की जरूरत बताई है।

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over tourism in udaipur

उदयपुर शहर के एक पर्यटन स्थल पर लगी पर्यटकों की भीड़

उदयपुर. झीलों की खूबसूरती और अरावली की वादियों से देश-दुनिया को लुभाने वाला उदयपुर अब 'ओवरटूरिज्म' (अत्यधिक पर्यटन) के गंभीर पर्यावरण संकट की तरफ बढ़ रहा है। पर्यटन सीजन और वीकेंड के दौरान शहर वास्तविक वहन क्षमता से कई गुना बोझ उठा रहा है, जिसका सीधा और घातक असर इकोसिस्टम पर पड़ रहा है। पर्यटन, मेवाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ जरूर है, पर अनियंत्रित और सस्टेनेबल मॉडल के अभाव में यह लेकसिटी के प्राकृतिक संसाधनों को तेजी से लील रहा है। मानसून सिर पर है और बारिश के बूंदों के साथ ही शहर में पर्यटकों की आवक शुरू होगी, जो फरवरी-मार्च तक जारी रहेगी। ऐसे में यह समय ही सबसे सही है जब इस मसले पर चिंता की जानी चाहिए।

शहर में हर साल 24 लाख पर्यटक

यूं तो शहर में सालभर मेें 22 लाख से 24 लाख औसतन पर्यटक आते हैं। यह औसतन 2 लाख पर्यटक हर माह होता है, पर गर्मी में पर्यटक कम आते हैं। वहीं पीक सीजन में नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फरवरी में बाकी महीनों की तुलना में 2 से 3 गुना पर्यटक आते हैं। यानी हर महीने अनऑफिशियलआंकड़े इससे कहीं ज्यादा हैं। इन चार महीनों में शहर ओवरटूरिज्म की मार झेलता है।

यह हो रहा है असर

1. झीलों और जलीय जीवन पर संकट: पानी में घुल रहा होटल-रिसॉर्ट का सीवरेज

पिछोला, फतहसागर और बड़ी लेक जैसे चुनिंदा पर्यटन स्थलों के पानी की जांच पर गंदा पानी और सीवरेज झीलों के किनारे बने होटलों, रिसॉर्ट्स और कमर्शियल विला से निकलने वाला अनुपचारित गंदा पानी और सीवरेज सीधे या परोक्ष रूप से वाटर बॉडीज में मिल रहा है।

2. वेस्ट मैनेजमेंट फेल: बड़ी लेक और सज्जनगढ़ के रास्तों पर कचरे का अंबार

पीक सीजन में सैलानियों की भारी आवक के कारण शहर के कचरा प्रबंधन और डंपिंग यार्ड पर क्षमता से कई गुना ज्यादा दबाव बढ़ गया। जिससे कचरे का दुष्प्रभाव शहर की आबो हवा और भूजल पर पड़ रहा है।वहीं इको-सेंसिटिव जोन वाले बड़ी लेक, शिल्पग्राम और सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क और दूसरे इकोलॉजिकल स्पॉट्स की पहाड़ियों के रास्तों पर प्लास्टिक की बोतलों, कैन और रैपर्स के ढेर लग रहे हैं। इन क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के साथ-साथ उनके जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है।

3. रिसॉर्ट्स के लिए काटे जा रहे पहाड़ और पेड़

सैलानियों के ठहरने की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए शहर के बाहरी और ग्रामीण इलाकों (बड़ी, कोडयात और चीरवा बेल्ट) में अरावली की पहाड़ियों को अंधाधुंध काटा जा रहा है। इससे उदयपुर की पूरा ईकोसिस्टम खतरे में पड़ गया है।

4. इको-सेंसिटिव जोन में दखल

होटलों और विला के निर्माण के लिए पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है। पेड़ों की अवैध कटाई हो रही है। इस भौगोलिक बदलाव के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है। स्थानीय वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

5. भूजल स्तर का अंधाधुंध दोहन: गांवों में गहराया पेयजल संकट

झीलों का शहर में शहर के भूजल पर ओवरटूरिज्म का सबसे बड़ा प्रहार हुआ है। बड़ी और कोडयात जैसे ग्रामीण पर्यटन क्षेत्रों में आलीशान रिसॉर्ट्स और विला रोज लाखों लीटर पानी जमीन से खींच रहे हैं। इन व्यवसायिक इकाइयां धड़ल्ले से किए गहरे बोरवेल के कारण आस-पास के गांवों और रिहायशी इलाकों का ग्राउंड वाटर लेवल खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुका है। इससे स्थानीय ग्रामीणों के सामने भी पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया।

6. वायु और ध्वनि प्रदूषण

टूरिस्ट सीजन और वीकेंड पर बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों से शहर का ट्रैफिक सिस्टम पूरी तरह चरमरा जाता है। शहर की क्षमता से दोगुनी गाड़ियां शहर में अंधाधुंध दौड़ती है। ओल्ड सिटी की संकरी गलियों और फतहसागर पाल के आस-पास घंटों लगने वाले जाम से वाहनों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन सामान्य दिनों से कई गुना बढ़ जाता है। साइलेंसर के धुएं के साथ-साथ पर्यटकों के वाहनों के कानफोड़ू हॉर्न के कारण ध्वनि प्रदूषण का ग्राफ भी तय मानकों को पार कर रहा है।

संरक्षण के लिए सस्टेनेबल/इको-टूरिज्म सेल बनाने की जरूरत- डॉ. पल्लवी

शहर के इको-सेंसिटिव जोन्स पर ओवरटूरिज्म के प्रभाव का अध्ययन करने वाली डॉ. पल्लवी गोठलकर का कहना है कि इन क्षेत्रों के संरक्षण के लिए 'सस्टेनेबल टूरिज्म/इको-टूरिज्म सेल' बनाने की जरूरत है। वन विभाग, पर्यटन विभाग, नगर निगम, यूडीए, पर्यावरणविदों और एनजीओ को मिलाकर साझा सस्टेनेबल टूरिज्म डेवलपमेंट सेल' बने, जो पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता तय करे। पर्यटन स्थलों पर निर्माण और कचरा फैलाने को लेकर कड़े नियम बनें। होटलों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की अनिवार्य और वास्तविक जांच हो। चुनिंदा और संवेदनशील झीलों पर दबाव कम करने के लिए आस-पास नए 'इको-टूरिज्म साइट्स' को विकसित हों, ताकि पर्यटकों का दबाव बंट सके।

शहर में बेहतर पर्यटन प्रबंधन और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है। उदयपुर में पर्यटकों की संख्या भी पूरे वर्ष समान नहीं रहती, बल्कि यह विशेष सीजन, त्योहारों और लंबे अवकाश के दौरान अधिक दिखाई देती है। ऐसे समय में बेहतर योजना और प्रबंधन की आवश्यकता होती है, न कि पर्यटन को दोष देने की।

राकेश चौधरी, सचिव, होटल संस्थान दक्षिणी राजस्थान