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Udaipur Sthapana Diwas : कभी मेवाड़-मालवा का प्रमुख चिकित्सा केंद्र था उदयपुर

रियासत काल की इमारत में संचालित अस्पताल को आजादी के बाद करीब 1955 में महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय का नाम दिया गया।

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डॉ सुशील स‍िंंह चौहान/ उदयपुर . आजादी के बाद मेवाड़ के चिकित्सा क्षेत्र में अकल्पनीय बदलाव हुए हैं। आयुर्वेद पर आश्रित रहे उदयपुर के जनमानस ने समय के साथ ऐलापैथी का अपनाया। वर्तमान महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय परिसर में स्थित सलूम्बर हाउस में वर्ष 1960 में रवींद्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक भवन की स्थापना हुई। पहले चार दीवारी में ऑक्सीजन देने वाले हरे वृक्षों के बीच महाराणा भूपाल चिकित्सालय चला करता था, जो लगातार निर्माण और मरीज भार के बीच कंक्रीट के जंगल का रूप लेने लगा। बीते 15 वर्षों के दौरान जिले के चिकित्सा विभाग में अमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। दूसरी ओर आयुर्वेद क्षेत्र में वर्ष 1944 को राडाजी चौराहे पर स्थापित पंडित मदन मोहन मालवीय महाविद्यालय उपेक्षा के चलते पिछड़ा गया है। गौर करें तो पूरे चिकित्सा क्षेत्र में 2004 के बाद खासे बदलाव हुए हैं। शहर में अब तीन मेडिकल कॉलेज के अधीन करीब 5000 शय्या वाले अस्पताल हैं, वहीं आधा दर्जन बड़े निजी चिकित्सालय खुले गए हैं। दूसरी ओर, विभिन्न की जांच एवं उपचार की विश्व तकनीक उपलब्ध होने से लोगों को राहत मिली है। ऐसे में उदयपुर मेवाड़-मालवा का प्रमुख चिकित्सा केन्द्र बन गया है।

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यूं आया बदलाव
- रियासत काल की इमारत में संचालित अस्पताल को आजादी के बाद करीब 1955 में महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय का नाम दिया गया।
- समय के साथ चिकित्सालय में 300 बेड की सुविधा थी, जो अब 14 सौ में
बदल गई।
-20 साल पूर्व चिकित्सालय का ओपीडी करीब 100 तक पहुंचता था, जो अब 5-7 हजार प्रतिदिन है। इसमें मेडिसिन, सर्जरी, गायनिक और आई, कुल 4 वार्ड थे, जो अब 54 वार्ड में बदल गए।
-आजादी के बाद चिकित्सालय में केवल 2 एक्स-रे मशीन थी, जो अब संख्या में 30 हो गई हैं। एक ऑपरेशन थियेटर की क्षमता वाले एमबी हॉस्पिटल में 14 ओटी बन गए हैं।
-वर्ष 2004 में पहली बार एमबी हॉस्पिटल को सिटी स्केन व एमआरआई की सुविधाएं मिलीं। सेंटर, ऑक्सीजन सेंटर, पॉली ट्रोमा वार्ड, कॉडियोलॉजी विभाग एवं स्क्रीन विभाग को विशेष बिल्डिंग के साथ संसाधन मिले।
-गुर्दा रोगियों के लिए 40 डायलिसिस मशीन, बीएससी व एमएससी नर्सिंग कॉलेज, इमरजेंसी व ओपीडी विंग, सुपर स्पेशिलिटी विंग सहित विशेष संसाधनों की उपलब्धता बढ़ती गई।
पहले चिकित्सालय में केवल 300 विशेषज्ञों, चिकित्सकों एवं नर्सिंग
स्टाफ था, जबकि अब यह संख्या 25 सौ पार है।


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