उज्जैन

उज्जैन के राजा भर्तृहरि से जब गोरखनाथ ने कहा, ये फल खाओ सदा जवान रहोगे…

Ujjain News: राजा भर्तृहरि प्राचीन उज्जैन के बड़े प्रतापी राजा हुए। राजा भर्तृहरि की तीन पत्नियां थीं, और वे अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर मोहित थे।

2 min read
Nov 21, 2019
Ujjain News: राजा भर्तृहरि प्राचीन उज्जैन के बड़े प्रतापी राजा हुए। राजा भर्तृहरि की तीन पत्नियां थीं, और वे अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर मोहित थे।

उज्जैन. राजा भर्तृहरि प्राचीन उज्जैन के बड़े प्रतापी राजा हुए। राजा भर्तृहरि की तीन पत्नियां थीं, और वे अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर मोहित थे। वे उस पर अत्यंत विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार पहुंचे। भर्तृहरि ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार सम्मान किया। इससे तपस्वी गुरु अतिप्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गुरु गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वे सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।

फल खाने के पहले यह सोचा राजा ने
चमत्कारी फल देकर गुरु गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया।

कोतवाल पर फिदा थी रानी
रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं, बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा, तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नरक समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेंगे, तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देते रहेंगे। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

तुम्हें यह फल कहां से मिला
राजा ने वैश्या से पूछा कि तुम्हें यह फल कहांं से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भर्तृहरि ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भर्तृहरि को पूरी सच्चाई मालूम हुई, तो वह समझ गए कि रानी पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भर्तृहरि के मन में वैराग्य जागा और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में तपस्या करने आ गए। उस गुफा में भर्तृहरि ने 12 वर्षों तक तपस्या की। उज्जैन में आज भी राजा भर्तृहरि की गुफा दर्शनीय स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। राजा भर्तृहरि ने वैराग्य पर वैराग्य शतक नामक ग्रंथ की भी रचना की, जो काफी प्रसिद्ध है। राजा भर्तृहरि ने शृंगार शतक और नीति शतक की भी रचनाएं कीं।

Published on:
21 Nov 2019 12:17 pm
Also Read
View All

अगली खबर