Charak Hospital ...It gets rented relief, Mother and Child
उज्जैन. प्रदेश की सबसे बड़ी मदर एंड चाइल्ड केयर यूनिट की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां बर्फीली हवा के बीच मरीज सिकुड़ रहे हैं और स्वास्थ्य विभाग खरीदी के लिए बजट नहीं होने की बात कर रहा है, जबकि चरक अस्पताल में उपकरण एवं अन्य सामग्री की खरीदी के लिए आए बजट में से 76 लाख का अधिकारी उपयोग ही नहीं कर सके। इधर यहां भर्ती होने वाले मरीजों को दान और किराए के कंबलों से काम चलाना पड़ रहा है।
450 बेड का चरक अस्पताल
450 बेड के चरक अस्पताल में हालत ये है कि यहां भर्ती होने वाले मरीजों को कंबल तक नसीब नहीं हो रहे हैं। यहां भर्ती मरीजों की संख्या में उपलब्ध कंबलों की संख्या आधे से भी कम है। पीडियाट्रिक विंग में केवल 25 कंबल ही उपलब्ध हैं। महिला मरीजों के लिए 110 कंबल हैं, जबकि शुक्रवार को यहां भर्ती मरीजों की संख्या 290 से अधिक थी। भर्ती मरीजों की संख्या को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि चरक अस्पताल में मरीजों का ठंड के कारण क्या हाल हो रहा है।
चरक अस्पताल में मरीजों की बदहाली के चलते कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं और राजनीतिक दलों ने यहां कंबल दान किए। 300 से अधिक कंबल यहां मरीजों के लिए दिए गए, जिनका उपयोग जिला अस्पताल एवं चरक अस्पताल में मरीज ओढऩे के लिए कर रहे हैं।
76 लाख रुपए लैप्स
अस्पताल में उपकरण और डिस्पोजेबल उपकरण (कंबल, बेडशीट, पलंग) की खरीदी के लिए डीएफआईडी ने 3.86 करोड़ रुपए दिए थे, लेकिन इनमें से 76 लाख रुपए विभाग द्वारा खरीदी नहीं किए जाने पर लैप्स हो गए।
मजबूरी : पुराने कंबलों से चला रहे काम
स्वास्थ्य विभाग में जिन कंबलों की खरीदी की जाती है। उनका जीवनकाल 2 साल का माना जाता है। दो साल के बाद इन कंबलों से रेशे निकलने लगते हैं, जो ओढऩे के दौरान श्वास के जरिए शरीर प्रवेश करते हैं। ये रेशे शरीर के लिए बेहद हानिकारक हैं। खासकर श्वसन तंत्र के। इसलिए कंबलों को दो साल में बदलने का नियम है। चरक अस्पताल में मरीजों को दिए जा रहे कंबल दो साल से अधिक पुराने हैं। बावजूद इन्हें मरीज ओढऩे को मजबूर है।
लोगों की पीड़ा
द्वारकाधीश जागीर निवासी उमेश नाथ ने बताया पत्नी उर्मिला ने 4 दिन पहले सीजर से बेटी को जन्म दिया। यहां ओढऩे के लिए खुद इंतजाम करने के लिए कहा गया। इसलिए रोजाना किराए से रजाई गद्दे लाते हैं। पत्नी के पास मां रुकती है। मैं भूतल पर सोता हूं। 5 दिन में 250 रुपए तो केवल रजाई गद्दे का किराया ही भर चुके हैं।
बेड़वन्या निवासी नानूराम ने बताया दो दिन पहले पत्नी हंसकुंवर ने नार्मल डिलेवरी से बेटे को जन्म दिया। किराए की रजाई कम गर्म थी इसलिए पत्नी को 400 रुपए की रजाई लाकर दी। खुद किराए की रजाई और गद्दे से काम चला रहे हैं। स्टाफ ने बताया समाजसेवी संस्थाओं ने जो कंबल दान किए थे। उसे मरीज के परिजन साथ में लेकर चले गए। यदि वे कंबल होते तो भी कम परेशानी आती।