
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में होली का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। सिंहपुरी क्षेत्र में सबसे पुरानी होलिका दहन की परंपरा है, जो प्रकृति संरक्षण की एक मिसाल है। आताल-पाताल महाभैरव क्षेत्र के अंतर्गत सिंहपुरी में 5 हजार कंडों की होलिका तैयार की जाती है। लोगों का कहना है कि यह दुनिया की एकमात्र प्राचीन होलिका है, जिसे कई सालों से इको फ्रेंडली होने का गौरव प्राप्त है। इसके कंडे भी जब पंक्तिबद्ध किए जाते हैं, तो साथ-साथ वेद मंत्र भी पढ़े जाते हैं। यह परंपरा सिंहपुरी में पीढ़ी दर पीढ़ी ब्राह्मणों द्वारा निर्वहन की जा रही है।
चार वेदों से होता है पूजन
प्रदोष काल में ही होलिका का पूजन होता है। चार वेदों के ब्राह्मण अलग-अलग दिशाओं में विराजते हैं और अपनी वैदिक परंपरा के माध्यम से ही पूजन की पद्धति को आगे बढ़ते हैं।
यह दुनिया की ऐसी होली है, जिसमें सिर्फ कंडे ही लगते हैं। तकरीबन 5001 कंडों की होलिका बनती है। इसे सबसे बड़ी इको फ्रेंडली होलिका होने का गौरव प्राप्त है। यहां पर अलग-अलग शाखाओं के ब्राह्मणों के जरिए होलिका का निर्माण किया जाता है और यथाविधि परंपरागत तरीके से होली के कंडों की एक पंक्ति तैयार की जाती है।
होलिका पूजन में महिलाएं अपने परिवार के साथ पूजन करने आती हैं। मान्यता है कि यहां होलिका पूजन करने से निःसंतान दंपती को संतान की प्राप्ति भी होती है।
होलिका के बीचोबीच भक्त प्रह्लाद का एक ध्वज लगाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ध्वज पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ध्वज हवा के साथ उड़कर नीचे आ जाता है। जिस भी श्रद्धालु के हाथ वह ध्वज लगता है उसको भाग्यशाली माना जाता है।
Updated on:
22 Mar 2024 02:32 pm
Published on:
22 Mar 2024 02:31 pm
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