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‘कई अंडर ग्राउंड संगठनों के सरगना मेरे शिष्य, सत्ता में भी हैं शरारती लोग’

गोवर्धन मठ पुरी पीठ के शंकराचार्य अधोक्षजानंद महाराज के बिंदास बोल, धार्मिक लोगों के लिए अशांति चुनौती है। धर्म, ज्ञान, यज्ञ और योग की परिकल्पना शांति के बिना नहीं कर सकते।

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Lalit Saxena

May 01, 2016

Many large underground organizations don my discip

Many large underground organizations don my disciple

उज्जैन. आदिशंकराचार्य ने नर बलि जैसी कुप्रथा समाप्त कर समाज को सही दिशा प्रदान की थी। उन्हीं का अनुसरण करते हुए सभी धर्मगुरुओं को देश में फैली अशांति दूर करने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। जो लोग आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद के रास्ते पर हैं, बंदूक की गोली से बात करना चाहते हैं, उनको मीठी बोली से ही सही मार्ग पर लाया जा सकता है।

भारत विश्वगुरु है। धार्मिक लोगों के लिए अशांति चुनौती है। धर्म, ज्ञान, यज्ञ और योग की परिकल्पना शांति के बिना नहीं कर सकते। कई बड़े अंडर ग्राउंड संगठनों के सरगना मेरे शिष्य हैं, वे भी मुझसे धर्म ज्ञान पाते हैं। मैं उन्हें इंसानियत के रास्ते पर चलने की सीख देता हूं। यह कहना है गोवर्धन मठ पुरी पीठ के शंकराचार्य अधोक्षजानंद महाराज का, उनसे दिलीप पटेल की बातचीत...

कहा जाता है कि अंडर ग्राउंड संगठनों के सरगनाओं के आपके से संपर्क हैं?
बिल्कुल सही बात है। कई बड़े अंडर ग्राउंड संगठन हैं, जिनके सरगना मेरे शिष्य हैं। जैसे उल्फा, मिजो, नागा, बोडो, हुर्रियत व अन्य। इन संगठनों के कमांडरों से मेरी बात भी होती है। हम धर्मगुरु हैं, हमारा काम लोगों को सही राह दिखाना है। वे भी धर्म ज्ञान लेते हैं। मैं उन्हें सही रास्ते पर चलने की सलाह देता हूं।

सबसे पहले किससे मिले थे और कहां पर, आपस में क्या बातें हुईं थीं?
1997 की बात है। हम कश्मीर गए थे। वहां अलगाववादी नेता मो. यासीन मलिक से मिला। मुझे जानकारी नहीं थी कि वे लोग कैसे हैं। जब मिला तो अच्छा लगा। मेरे साथ सीआरपीएफ का स्टाफ था, लेकिन मुझे अकेले ही बुलाया गया था। मजहबी बातें हुईं। वह भी चाहता था कि बातचीत से ही हल निकाला जाए। खून-खराबा ठीक नहीं है।

किसी ने आपकी बात मानी?
इसका प्रतिफल तो मिला है। हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन मेरे शंाति वार्ता के प्रस्ताव से सहमत हुए थे। परामर्श करने के लिए वे इलाहाबाद तक आ गए थे, लेकिन उसी समय उनकी मौत हो गई। उल्फा ने युद्ध विराम कर रखा है। उसके कमांडरों को भी मैंने शांति की राह पर चलने का आदेश दिया है।

आप मानते हैं कि सही दिशा में कदम उठ रहे हैं?
वे कहते हैं कि कश्मीर हमारा है, यह नहीं कहते कि कश्मीरी हमारे हैं। जो सरहदों पर शरारत कर रहे हैं, उनसे गले मिलने बिना इंटेलीजेंस की सलाह के पहुंच जाते हैं। जवानों की गर्दन काटने वालों से हाथ मिलाएंगे तो हम कैसे सहमत होंगे। पठानकोट हमला अभी हुआ है। कैसे मान लें, सरकार का कदम सही है।

क्या आप मानते हैं कि सभी धर्मगुरु पहल करें तो सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं?
बिल्कुल। हमारी परंपराएं गुरुकुल की हैं। लोग गुरुजन की बात पर विश्वास करते हैं, क्योंकि उनको मालूम है कि गुरु सत्य कहेगा। राजनेताओं की तरह राजनीतिक रोटियां तो सेंकनी नहीं है, इसलिए अगर सभी धर्मगुरु एक मंच पर आएं और आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद के खिलाफ शंखनाद करें तो सकारात्मक परिणाम निकलेंगे।

आप कहते हैं कि बातचीत से हल ढूंढ़ा जा सकता है, तो इसकी पहल क्यों नहीं हो पा रही है?
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के समय वर्ष 2000 में बातचीत का मन बना था। केसी पंत को भेजा गया था, लेकिन अलगाववादियों ने यह कहते हुए मना कर दिया था कि 72 हजार लोग कस्टडी डेथ में हैं। ऐसे में बात करने का कोई मतलब नहीं। इसी तरह नक्सलवादियों से बात शुरू होनी थी, लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम् तैयार नहीं हुए। कुल मिलाकर दोनों ही तरफ कुछ ऐसे शरारती लोग हैं, जो हल नहीं चाहते हैं।

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