
11 Ayurveda Hospital in a population of six lakh
उमरिया. दो दशक बीतने के बाद भी जिला में आयुर्वेद उपचार सुविधा विकसित नहीं हो सकी है। छह लाख से भी अधिक की आबादी वाले इस जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 11 औषधालय हैं, उनमेें भी न पर्याप्त स्टाफ है और न दवाओं की उपलब्धता है। जिला मुख्यालय की हालत यह है कि यहां 30 बिस्तरा आयुष अस्पताल तो क्या एक औषधालय भी नहीं है। नगर के लोगों को अगर आयुर्वेद का इलाज कराना हो तो उन्हे 70 किलोमीटर दूर शहडोल या कटनी जाना पड़ता है। बताया जाता है कि यहां विकास के नाम पर केवल आयुर्वेद अधीक्षक का कार्यालय बनवा दिया गया है। शेष ढांचा तब का है, जब यहां आयुर्वेद चिकित्सा का संचालन शहडोल जिले से होता था और उमरिया जिला नहीं बना था। इस चिकित्सा सुविधा के विकास के लिए न तो जनप्रतिनिधि पहल करते और न प्रशासनिक अधिकारी रुचि लेेते हैं। बताया गया है कि जनता की स्वास्थ्य सुविधा और आयुर्वेद चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए कुछ वर्षों पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने निर्देश जारी किए थे कि जिले के एलोपैथी शासकीय अस्पताल परिसर में ही आयुष विंग भी संचालित की जाए और रोगियों की जांच तथा दवाओं की व्यवस्था की जाए। ताकि जो रोगी अपना इलाज आयुर्वेदिक पद्धति से लेना चाहता है उसे सरलता से इलाज मिल सके। लेकिन आज तक यहां ऐसा न तो विंग कायम हुआ और न जिला अस्पताल परिसर में कोई सुविधा दी गई। इसके अलावा अभी तक जिले के मुख्यालय में आयुष की अस्पताल भी संचालित नहीं हुई। जबकि अस्पताल संचालित होने से वात, पेट और बुखार आदि के पुराने रोगियों को भर्ती कर उनका पंचकर्म से विशेष उपचार करने की सुविधा दी जा सकती है। जिले के रोगी पंचकर्म उपचार से वंचित हैं।
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति वर्षों पुराने केवल 11 औषधालयों पर आश्रित है। जो कि अखड़ार, निगहरी, रहठा, बिलासपुर , रोहनियां, चचरिया, इंदवार, चिल्हारी आदि जैसे दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में संचालित हैं। इन औषधालयों में से केवल तीन औषधालय हैं। जहां तीन डॉक्टर पदस्थ हैं। शेष किसी औषधालय में डॉक्टर नहीं हैं। छह औषधालय तो ऐसे हैं जहां कंपाउडर तक नही हैं। इन औषधालयों में डाक्टर सप्ताह में दो दिन विजिट करते हैं। शेष दिन औषधालय सेवक केन्द्र का ताला खोलकर घंटे-दो घंटे खाली बैठा रहता है और फिर ताला बंद कर चला जाता है। डॉक्टरों की कमी के कारण केन्द्रों में न तो रोगियों की जांच पड़ताल हो पाती है और न रोगी वहां जाना पसंद करते हैं। जिन औषधालयों में कंपाउण्डर पदस्थ हैं वहां की व्यवस्था कंपाउण्डरों के भरोसे है। वहां कंपाउण्डर रोगियों को सर्दी बुखार व पेटदर्द आदि की सामान्य दवाएं दे देता है, लेकिन रोगियों की जांच पड़ताल नहीं हो पाती है। कई औषधालय वर्षों पुराने किराए के एक या दो कमरों में संचालित हो रहे हैं। इनकी हालत अत्यंत जर्जर है। यहां न तो दवाएं रखने की कोई व्यवस्था है और न आल्मारियां आदि की व्यवस्था है। दवाओं को चूहे कुतरते हैं और बरसात में छप्पर से पानी टपकने के कारण दवाएं खराब भी होतीं हैं। दवाओं के खराब होने से उन्हे नष्ट कर दिया जाता है, लेकिन व्यवस्था की कमी के कारण वे रोगियों तक नहीं पहुंच पातीं हैं। बताया गया कि औषधालयों में जगह की भी कमी रहती है। वहां रोगी के न तो बैठने की जगह रहती है और पेयजल आदि की सुविधा है। भवन निर्माण हेतु प्रस्ताव भेजा गया है लेकिन अभी तक स्वीकृत नहीं मिली है।
इनका कहना है
आयुर्वेद चिकित्सा व्यवस्था के संबंध में शासन को अवगत कराया जाता है, लेकिन अभी तक कोई मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हुआ है। संसाधन और व्यवस्था उपलब्ध होने से आम आदमी को निश्चित रूप से इस चिकित्सा पद्धति का लाभ मिलेगा।
डॉ. विनोद सिंह, आयुष अधीक्षक, उमरिया।

Published on:
05 Jun 2018 05:16 pm

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