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झांसी के इस गुमनाम किले से उठी थी आजादी की चिंगारी

153 साल बाद सन् 2010 में पहली बार खोला गया था जनता के लिए

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Sujeet Verma

Jan 21, 2016

बी.के. गुप्ता

झांसी.
साल 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दीपशिखा महारानी लक्ष्मीबाई की नगरी के नाम से जानी जाने वाली झांसी में एक नहीं, दो-दो किले हैं। एक किले के बारे में तो ज्यादातर लोग जानते हैं। इसमें लोग घूमने भी जाते हैं। यहां पर एक किला ऐसा भी है, जो छिपा हुआ सा (गुप्त) है। इसी किले से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी उठी थी।


यह किला न तो सामान्य रूप से लोगों को दिखाई देता है और न ही इसको दिखाने की कोई व्यवस्था है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस किले को सन 1857 की क्रांति के 153 साल बाद पहली बार जनता के लिए खोला गया। वर्ष 2010 में इस क्रांति की 154वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में चुनिंदा लोगों को इस किले को देखने के मौका मिला।


आकृति के आधार पर मिला नाम


जी हां, यहां बात हो रही है स्टार फोर्ट की। इसकी षट्कोणीय बनावट के कारण ही इसको स्टार फोर्ट का नाम मिला। दरअसल, इसके पास में जाकर इसे देखने से इसकी आकृति को नहीं समझा जा सकता है। केवल हवाई यात्रा के दौरान पर्याप्त ऊंचाई से देखने पर इसका ऐरियल व्यू स्टार नुमा आकृति दर्शाता है।


वह भी अब आसपास के पेड़ों आदि की वजह से काफी मुश्किल से नजर आता है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस किले के एक कोण को तोप से उड़ा दिया गया था। तब से इसके पांच कोण तो स्पष्ट दिखते हैं, छठा कोण गायब है। हालांकि, आकृति को देखकर उसका अनुमान आसानी से लग जाता है।


अंग्रेजों ने इसे बनवाया था अभेद्य

अंग्रेजों ने अपने खजाने और सैन्य साजो-सामान की सुरक्षा की दृष्टि से इसे अभेद्य बनवाया था। इसीलिए इसे अलग ही अंदाज में बनवाया गया था। न तो लोग इसके बारे में जान सकें और न ही समझ सकें। इस स्टार फोर्ट का निर्माण झांसी, कानपुर व खजुराहो की ओर जाने वाली सड़कों के जंक्शन के नजदीक किया गया। उस वक्त इस जंक्शन को रिसाला चुंगी कहा जाता था।


सन् 1820 से 1822 के बीच बने इस किले के अंदर ही अंग्रेजों ने अपना कोषागार बनाया। एक शस्त्रागार बनाया। एक बैंक बनाया। इसके साथ ही सुरक्षा के लिहाज से यहां ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी 14 कैवलरी को रखा गया। साथ ही लगान न देने वालों को यहां बंदी के तौर पर रखने के लिए एक बंदीगृह भी इस किले में बनवाया गया। किले की बाह्य सुरक्षा के लिए छह कोण वाले स्टार फोर्ट के हर कोने पर एक तोप भी लगाई गई।


14वीं कैवलरी में हुआ विद्रोह

4-5 जून सन् 1857 को स्टार फोर्ट की अंग्रेजों की सैन्य टुकड़ी 14वीं कैवलरी में शामिल भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के बाद इस स्टार फोर्ट के साथ ही झांसी शहर फोर्ट पर भारतीय सैनिकों का कब्जा हो गया। इसमें से शहर फोर्ट की बागडोर महारानी लक्ष्मीबाई ने संभाली। यहीं से अपना राज चलाया। रानी झांसी के नाम से पहचान रखने वाला यह किला आजकल पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, जबकि स्टार फोर्ट भारतीय सेना के।


सैनिकों के सम्मान में 153 साल बाद हुआ आयोजन

देश भर में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सैनिकों द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और झांसी में14कैवलरी केभारतीय सैनिकों के स मान में यहां पर सन् 2010 में जून में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें झांसी के लोगों को भी इस ऐतिहासिक स्थल को देखने के लिए आमंत्रित किया गया। इस कार्यक्रम के सूत्रधार बने बुंदेलखंड लोक कला संगम संस्थान के अध्यक्ष मुकुंद मेहरोत्रा। इस कार्यक्रम का आयोजन सेना की व्हाइट टाइगर डिवीजन के तत्वावधान में किया गया। इसमें 31वीं आ र्ड डिवीजन के तत्कालीन जीओसी एके सिंह, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति डा.बी.एस राना के साथ ही तत्कालीन मेयर डा.बी.लाल समेत अनेक लोग मौजूद रहे।