
फोटो सोर्स- भजन मार्ग
Which is better for home and temple worship? मथुरा के वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज जनसाधारण से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देकर उनका निवारण करते हैं। इनमें अधिकांश प्रश्नोत्तर रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हुए होते हैं। इसी प्रकार का एक प्रश्न भक्त ने प्रेमानंद महाराज से किया कि घर में पूजा करने और मंदिर में पूजा करने में क्या अंतर है? इसका उत्तर प्रेमानंद महाराज ने सरल शब्दों में दिया, बोले "स्थान का अपना एक महत्व होता है और वहां की जप-तप पूजा-अर्चना कई गुना ज्यादा लाभदायक होती है।" इधर शादी के बाद कथावाचक इंद्रेश ने प्रेमानंद महाराज से पहली मुलाकात की। इस मौके पर उन्होंने राधा गिरधरलाल की फोटो भेंट की। दोनों के बीच राधा गिरधरलाल की लीलाओं को लेकर चर्चा हुई।
उत्तर प्रदेश के मथुरा में संत प्रेमानंद महाराज से मिलने आए एक भक्त ने प्रश्न किया कि घर में पूजा और मंदिर की पूजा में क्या अंतर है। इस पर संत प्रेमानंद महाराज ने कहा कि घर और मंदिर की पूजा में बहुत अंतर होता है। मंदिर पवित्र स्थान पर होता है, जहां की ऊर्जा अधिक शक्तिशाली होती है। मंदिर में पूजा करने से श्रद्धा और भक्ति बढ़ जाती है। पूजा का फल भी अधिक मिलता है।
संत प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मंदिर में देवता स्थापित होते हैं और संतों का भी सानिध्य मिलता है जो पूजा के फल को कई गुना बढ़ा देते हैं। घर में 1000 माला का जाप गौशाला के 100 माला जप के बराबर होता है, जबकि तीर्थ स्थल पर एक माला जपने से वही फल मिलता है। लेकिन वृंदावन की एक माला अन्य स्थानों की एक लाख बार माला जपने के बराबर होती है।
कथावाचक इंद्रेश कुमार की शादी 5 दिसंबर 2025 को जयपुर में हुई थी। जिसके बाद उनकी पहली मुलाकात संत प्रेमानंद महाराज से हुई। इस दौरान उन्होंने राधा गिरधरलाल की फोटो भेंट की। जिसे देखकर प्रेम महाराज प्रसन्न हो गए। इस मौके पर संत प्रेमानंद महाराज ने पूछा कि सेहरा किसके बांधा गया? इस पर इंद्रेश ने बताया कि जुगल के सेहरा बांधा गया और बीच में ठाकुर जी विराजमान थे
संत प्रेमानंद महाराज ने कहा कि ठाकुर जी को अपनापन पसंद है। भजन क्रिया और तपस्या सब उसके फल हैं। महान भक्तों में यह देखा गया है कि "उनमें मेरे ठाकुर या प्रियता जैसी ललक दिखाई पड़ती है और वह ठाकुर के पास पहुंच जाते हैं।" ठाकुर जी को भी यही प्रियता आकर्षित करती है।
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि भगवान की चर्चा करते हुए कभी किसी चीज की आशा मत रखिए। भगवान की चर्चा भगवान की प्रसन्नता के लिए करनी चाहिए। तो यह जीवन प्रेममय हो जाएगा। अर्थ यानी रुपया-पैसा लोगों के बैंकों और घरों में न जाने कितना जमा है। इसका कोई महत्व नहीं है। आज कथा से ज्यादा अर्थ को महत्व दिया जाता है। जबकि भगवान की कथा को मुख्य मानना चाहिए। यदि आप भगवान के चरणों की सेवा में लगे हैं तो अर्थ आपकी सेवा में लगा रहेगा। अर्थ की प्रधानता को न रखते हुए भगवान की अद्भुत महिमा का गान करते हुए स्वयं प्रफुल्लित हों, यही गिरधरलाल से प्रार्थना है।
Published on:
18 Jan 2026 08:50 am
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