
अनंत चतुर्दशी
वाराणसी. अनंत चतुर्दशी हिंदू धर्म के ईश्वर जगत में अनंत रूप में विद्यमान है। यह दुनिया के पालनहार प्रभु की अनंतता का बोध कराने वाला एक कल्याणकारी व्रत है, जिसे 'अनंत चतुदर्शी' के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को 'अनंत चतुर्दशी' कहा जाता है। इसी दिन अनंत चतुर्दशी का व्रत भी रखा जाता है और इस दिन अनंत भगवान की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने वाले को सुबह स्नान करने के बाद किसी पवित्र नदी या फिर तलाब के किनारे बैठकर व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए।
अनंत सूत्र धारण करने से मुसीबतों से मिलती है मुक्ति
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान (श्रीहरि) की पूजा करके बांह पर अनंत सूत्र बांधा जाता है। भक्तों का ऐसा विश्वास है कि अनंत सूत्र धारण करने से हर तरह की मुसीबतों से रक्षा होती है साथ ही हर तरह से साधकों का कल्याण होता है। यदि ऐसा संभव न हो सके तो फिर घर में कलश स्थापित कर कलश पर शेषनाग के ऊपर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति या फोटो स्थापित करना चाहिए।
समुद्र मंथन से हुई थी अनंत भगवान की प्राप्ति
भगवन विष्णु के सामने चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र को एक खीरा से लपेटकर रखना चाहिए। कथा है कि इसी तरह समुद्र मंथन किया गया था समुद्र मंथन के बाद अनंत भगवान मिले थे। इसलिए खीरा को दूध से भरे एक पवित्र पीतल के बर्तन में मंथन करें।
अनंत सूत्र बांधने से पहले पढ़ें ये मंत्र
फिर "ॐ अनंताय नम:" मंत्र से भगवान विष्णु और अनंत सूत्र की पूरी विधि से पूजा करें।
पूजा के बाद अनंत सूत्र को मंत्र पढ़ने के बाद पुरुष को अपने दाहिने हाथ में और स्त्री को अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए। अनंत सूत्र बांधने के बाद ब्राह्मणों को नैवेद्य (भोग) में पकवान देने के बाद ही परिवार के सभी सदस्य को भोजन करना चाहिए। पूजा के बाद व्रत की कथा को पढें या फिर सुनें।
आज के दिन होता है गणेश विसर्जन
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश का विसर्जन किया जाता है। इस बार गणेश महोत्सव की शुरुआत 25 अगस्त से हुईं थी। यह पर्व 10 दिनों तक चलता है और इस बार यह 5 सितंबर तक रहेगा। लोग गणेश चतुर्थी वाले दिन से अपने घरों में गणपति को स्थापित करते है फिर एक दिन, तीन दिन, पांच दिन और दस दिनों बाद गणेश जी का विसर्जन करते है।
पाण्डवों ने भी किया था अनंत व्रत
अनंत चतुर्दशी के दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्त सूत्र बांधा जाता है। मान्यता है कि जब पाण्डव सारा राज-पाट हारकर वनवास के दुख भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अनन्त चतुर्दशी व्रत करने को कहे। श्री कृष्ण के कहे अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से इस व्रत का पालन किया तथा अनन्त सूत्र धारण किया जिसके फलस्वरुप पाण्डवों को अपने समस्त कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है।
Published on:
04 Sept 2017 02:02 pm

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