वाराणसी. एक तरफ जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त निर्देश दिए हैं कि चुनाव में धर्म,जाति और संप्रदाय को आधार नहीं बनाया जाए। लेकिन यूपी और खास तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति ही जातीय समीकरणों पर ही आधारित है। ऐसा नहीं कि केवल ग्रामीण अंचल में ही इसका ज्यादा जोर है। बल्कि शहरी सीटों की राजनीति भी जातीय आधार पर ही कहीं ज्यादा आधारित है। यही वजह है कि हर प्रत्याशी या यूं कहें कि हर दावेदार पर पहले यह पता करता है कि कहां कौन सी जाति की बहुलता है। उसी आधार पर दावेदारी पेश करता है।
जातीय वोट को माना जाता है बेस वोट बैंक
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जातीय वोट को बेस वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में हर दावेदार पहले अपनी बिरादरी के वोटों की संख्या का पता लगाता है। फिर वह उसे बेस वोटबैंक मान कर दावेदारी पेश करता है। वे कहते हैं कि वाराणसी कैंटोन्मेंट विधानसभा को लें तो यहां कायस्थ वोट 35 हजार है। नतीजा सामने है, इस सीट पर 1991 से अब तक श्रीवास्तव परिवार का कब्जा है। 1991 में पहली बार भाजपा के टिकट पर ज्योत्सना श्रीवास्तव विजयी हुईं, फिर 1993 में भी उन्होने इस सीट पर कब्जा किया। उसके बाद उनके पति हरिश्चंद्र श्रीवास्तव हरीश जी ने 1996 में जीत हासिल की। वह 2002 में भी इस सीट पर काबिज हुए। 2007 और 2012 में पुनः ज्योत्सना श्रीवास्तव मैदान में उतरीं और फतह हासिल की। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2012 में ज्योत्सना श्रीवास्तव के निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे कांग्रेस के अनिल श्रीवास्तव। कारण साफ है नए परिसीमन के बाद कैंटोन्मेंट विधानसभा का बड़ा ग्रामीण इलाका कट गया। यह सीट पूरी तरह से शहरी हो गई। इससे पहले 2007 तक जब इस विधानसभा में ग्रामीण इलाके जुड़े रहे तो यहां भूमिहार बिरादरी बोलबाला रहा। लिहाजा
इस सीट पर भूमिहारों ने लगातार कब्जा किया। मसलन शतरुद्र प्रकाश जिनकी भूमिहार बिरादरी पर अच्छी पकड़ थी। उनकी ससुराल इसी बिरादरी से जुड़ी रही सो उन्होंने इसका फायदा भी हासिल किया। इसके अलावा मांडवी प्रसाद, लाल बहादुर जैसों ने सीट पर कब्जा किया।
वाराणसी कैंट विधानसभा क्षेत्र का जातीय आंकड़ा
सवर्ण-
ब्राह्मण-40,000, बुद्ध और जैन-7,500, ठाकुर-10,000, कायस्थ-35,000, भूमिहार-12,000, अन्य सवर्ण-10,000, कुल- 115,000