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क्षत्रिय बाहुबलियों को कोई नहीं तोड़ पाया तिलस्म, इनके बाहुबल के आगे नतमस्तक हुए राजनीतिक दल

 पूर्वांचल की राजनीति की बात की जाये और क्षत्रिय बाहुबलियों को जिक्र नहीं आये।

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Devesh Singh

Sep 17, 2016

Bahubali

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वाराणसी. पूर्वांचल की राजनीति की बात की जाये और क्षत्रिय बाहुबलियों को जिक्र नहीं आये। ऐसा संभव नहीं है। समय के साथ राजनीति में बहुत परिवर्तन हुआ है लेकिन इन क्षत्रिय बाहुबलियों ने हमेशा यह साबित किया है कि सरकार किसी की भी रहे चलता तो हमारा ही सिक्का है। यूपी में पहले तो विकास के नाम पर वोट मांगने के लिए राजनीतिक दल आगे आते हैं और चुनाव के करीब आते ही उनकी सारी राजनीति क्षत्रिय बाहुबलियों के बीच सिमट जाती है।ac
पूर्वांचल में आज भी बाहुबलियों की चलती है। सत्ता के साथ रहे या फिर विपक्ष में। क्षत्रिय बाहुबलियों ने अपना रास्ता खुद तैयार किया है। पूर्वांचल के बड़े बाहुबली क्षत्रिय नेता में पहला नाम बृजभूषण शरण सिंह का आता है। बृजभूषण शरण सिंह के यहां यूपी के नामी बाहुबली सलामी करने आते हैं। कैसरगंज से बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर कई अपराधिक मुकदमे दर्ज हैं लेकिन क्षत्रिय समाज में बृजभूषण शरण सिंह का इतना नाम है कि उन्हें पार्टी व जगह की जरूरत नहीं होती है जहां से भी चुनाव लड़ते है अपने बाहुबल से जीत कर दिखाते हैं। कुंडा के रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का नाम तो प्रदेश की जनता के जुबान पर चढ़ा रहता है। राजा भैया को सपा व बीजपी का साथ मिलता है लेकिन उन्हें चुनाव जीतने के लिए किसी पार्टी के सिंबल की जरूरत नहीं होती है। राजा भैया को राजनीतिक कारणों के चलते लम्बे समय तक जेल में भी रहना पड़ा था लेकिन उससे उनके राजनीति कॅरियर पर असर नहीं पड़ा है और आज भी प्रतापगढ़ में एक ही नाम बोलता है वह है क्षत्रिय बाहुबली नेता राजा भैया। धरहरा के मिट्टी में जन्म लिए बाहुबली क्षत्रिय नेता बृजेश सिंह के नाम से यूपी के अतिरिक्त बिहार, उड़ीसा, एमपी भी कांपता था। एक समय बृजेश सिंह के उपर पांच लाख का इनाम था। बृजेश सिंह ने पहली बार वर्ष 2012 में विधानसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन वह हार गये थे बाद में उन्होंने वर्ष 2016 में एमएलसी चुनाव जीत कर अपने बाहुबल का दम दिखाया था। खास बात है कि सपा की सरकार होने के बाद भी इस क्षत्रिय बाहुबली ने सीएम अखिलेश के प्रत्याशी को शिकस्त दे दी थी।

जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह भी अपने बाहुबल के चलते चर्चा में आ थे। एक समय अपराध जगत में धनंजय सिंह का नाम इतना अधिक प्रसिद्ध हो गया था कि पुलिस को काउंटर तक करना पड़ गया था बाद में पता चला था कि जिस माफिया का काउंटर किया गया है वह धनंजय सिंह नहीं है। बाहुबली क्षत्रिय नेता धनंजय सिंह ने बिना किसी बड़े दल के सहारे चुनाव जीता था और फिर वह बसपा के चुनाव चिहृन पर सांसद बने थे। वर्तमान समय बाहुबली क्षत्रिय नेता किसी दल में नहीं है और निर्दल ही यूपी में होने वाले 2017 के विधानसभा चुनाव में ताल ठोंक सकते हैं। जौनपुर के अभय सिंह को राजा भैया का करीबी माना जाता है। इस बाहुबली क्षत्रिय नेता का नाम तब सामने आया था जब धनंजय सिंह के साथ गोलीबारी हुई थी। अभय सिंह भी बाहुबली क्षत्रिय नेता है और इनके उपर भी कई मुकदमे दर्ज है। फिलहाल वह फैजाबाद के गोसाईपुर से सपा के विधायक है।

क्यों होते हैं बाहुबली क्षत्रिय नेता के आगे राजनीतिक दल नतमस्तक
राजनीतिक दलों को बाहुबली क्षत्रिय नेता के आगे नतमस्तक होने का खास कारण है। इन बाहुबलियों को क्षत्रिय समाज को अच्छा समर्थन मिलता है। इसके अतिरिक्त बाहुबलियों के पास पैसा व चुनाव लडऩे के वह सारे हथियार होते हैं जिनकी चुनाव जीतने में बहुत जरूरत होती है।

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