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श्मशान में जलती चिताओं के बीच सारी रात क्यों थिरकतीं हैं ‘सेक्स वर्कर्स’

इस खास रात को श्मशान पर मातम के जगह सजती है नगरवधुओं की महफिल

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Sarweshwari Mishra

Sep 30, 2016

Manikarnika Ghat

Manikarnika Ghat

वाराणसी. जीवन के उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी का सफर बहुत लम्बा होता है। लेकिन जब यह सफर खत्म होता है तो धन दौलत, उद्देश्य, मोह- माया इन सभी का कोई मोल नहीं रहता। जिसे पाने के लिए इंसान अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देता है। जन्म के समय भले ही उस शिशु की आंखों में हजार सपने होते हैं लेकिन जब किसी का अंत होता है तो उसके हाथ एकदम खाली होते हैं। शायद यही जीवन की एक अटल और कड़वी सच्चाई है। क्योंकि अंत में सभी को खाली हाथ श्मशान ही आना पड़ता है।




काशी का मणिकर्णिका घाट एक ऐसा ही स्थान है जहां पहुंचकर व्यक्ति को अपने जीवन की असलियत पता चलती है। वह अपनी दुनिया में लाख मशगूल सही लेकिन जब मणिकर्णिका घाट पर शव को जलाया जाता है तो ये पूरी दुनिया ही बेमानी लगती है।




काशी के उस श्मशान पर जिसके बारे में ये मशहूर है कि यहां चिता पर लेटने वाले को सीधे मोक्ष मिलता है। दुनिया का वो इकलौता श्मशान जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। लेकिन इस श्मशान पर दहकती चिताओं के बीच मातम को छोड़ तेज़ संगीत पर लड़कियां थिरकने लगें और जब मौत की ख़ामोशी डांस की मस्ती में बदल जाए तो फिर चौंकना लाजिमी है।
लेकिन काशी का प्रसिद्ध श्मशान घाट जहां मृतक को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस घाट के लिए एक रात जो बहुत खास है। क्योंकि ये रात इस श्मशान के लिए जश्न की रात है। क्योंकि इस रात चिताएं भी जलती हैं और घुंघरुओं और तेज संगीत के बीच कदम भी थिरकते हैं।



लेकिन यह सवाल हर के जेहन में उठता है कि आखिर क्यूं ये लड़कियां इंसान को मरने के बाद भी चिता पर सुकून मयस्सर नहीं होने दे रही हैं। साल में एक बार एक साथ चिता और महफिल दोनों का ही गवाह बनता है काशी का मणिकर्णिका घाट। क्योंकि ये रात इस श्मशान पर साल में सिर्फ एक बार उतरती है और बस इसीलिए साल के बाकी 364 रातों से ये रात बिलकुल अनोखी बन जाती है। वही मणिकर्णिका घाट जो सदियों से मौत और मोक्ष का भी गवाह बनता आया है। चैत्र नवरात्रि अष्टमी को इस घाट पर मस्ती में सराबोर एक चौंका देने वाली महफ़िल सजती है। एक ऐसी महफ़िल जो जितना डराती है उससे कहीं ज्यादा हैरान करती है।



क्या है इस महफिल का सच
दरअसल चिताओं के करीब नाच रहीं लड़कियां शहर की बदनाम गलियों की नगर वधु होती हैं। कल की नगरवधु यानी आज की तवायफ। लेकिन न तो यहां जबरन लाया जाता है ना ही इन्हें इन्हे पैसों के दम पर बुलाया जाता है। काशी के जिस मणिकर्णिका घाट पर मौत के बाद मोक्ष की तलाश में मुर्दों को लाया जाता है वहीं पर ये तमाम नगरवधुएं जीते जी मोक्ष हासिल करने आती हैं। वह मोक्ष जो इन्हें अगले जन्म में नगरवधू ना बनने का यकीन दिलाता है। इन्हें यकीन है कि अगर इस एक रात ये जी भरके यूं ही नाचेंगी तो फिर अगले जन्म में इन्हें नगरवधू का कलंक नहीं झेलना पड़ेगा। इनके लिए जीते जी मोक्ष पाने की मोहलत बस यही एक रात देता है। साल में एक बार ये मौका आता है चैत्र नवरात्र के आठवें दिन। इस दिन श्मशान के बगल में मौजूद शिव मंदिर में शहर की तमाम नगरवधुएं इकट्ठा होती हैं और फिर भगवान के सामने जी भरके नाचती हैं। यहां आने वाली तमाम नगरवधुएं अपने आपको बेहद खुशनसीब मानती हैं।



सैकड़ों साल पुरानी है यह परम्परा
काशी के मर्णकर्णिकाघाट पर ये सबकुछ अचानक यूं ही नहीं शुरू हो गया। बल्कि श्मशान के सन्नाटे के बीच नगरवधुओं के डांस की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। मान्यताओं के मुताबिक आज से सैकड़ों साल पहले राजा मान सिंह द्वारा बनाए गए बाबा मशान नाथ के दरबार में कार्यक्रम पेश करने के लिए उस समय के जाने-माने नर्तकियों और कलाकारों को बुलाया गया था लेकिन चूंकि ये मंदिर श्मशान घाट के बीचों बीच मौजूद था, लिहाजा तब के चोटी के तमाम कलाकारों ने यहां आकर अपने कला का जौहर दिखाने से इनकार कर दिया था।

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लेकिन चूंकि राजा ने डांस के इस कार्यक्रम का ऐलान पूरे शहर में करवा दिया था, लिहाज़ा वो अपनी बात से पीछे नहीं हट सकते थे। लेकिन बात यहीं रुकी पड़ी थी कि श्मशान के बीच डांस करने आखिर कौन आएगा।


इसी उधेड़बुन में वक्त तेज़ी से गुज़र रहा था। लेकिन किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जब किसी को कोई उपाय नहीं सूझा तो फैसला ये लिया गया कि शहर की बदनाम गलियों में रहने वाली नगरवधुओं को इस मंदिर में डांस करने के लिए बुलाया जाए।


उपाय काम कर गया और नगरवधुओं ने यहां आकर इस महाश्मशान के बीच डांस करने का न्योता स्वीकार कर लिया। ये परंपरा बस तभी से चली आ रही है। गुज़रते वक्त के साथ जब नगरवधुओं ने अपना चोला बदला तो एक बार फिर से इस परंपरा के रास्ते में रोड़े आ गए। आज की तारीख में इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए बाकायदा मुंबई की बारगर्ल तक को बुलाया जाता है।



यही नहीं परंपरा किसी भी क़ीमत पर छूटने ना पाए, इसका भी ख़ास ख्याल रखा जाता है और इसके लिए साल के इस बेहद खास दिन तमाम इंतज़ाम किए जाते हैं। इस आयोजन को ज़्यादा से ज्यादा सफ़ल बनाने के लिए पुलिस-प्रशासन के नुमाइंदे बाकायदा इस महफिल का हिस्सा बनते हैं। इस परंपरा की जड़ें कितनी गहरी हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बनारस आने वाले कई विदेशी सैलानी भी इस ख़ास मौके को देखने से खुद को नहीं रोक पाते।
ये बेहद अनोखी और चौंकाने वाली परंपरा जितनी सच है उतना ही सच है इन नगरवधुओं का वजूद जो हर जमाने में मोक्ष की तलाश में यहां आता रहा है।

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