डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. शिव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का है खास महत्व। उसमें भी शिव बारात का तो पूछना ही क्या ? काशी की परंपरा में भले ही इसे लक्खा मेला में शामिल न किया गया हो पर इससे बड़ा उत्सव कोई दूजा नहीं। हजारों-हजार शिव भक्त आदि देव की बारात में बाराती के रूप में शामिल होते हैं। बारात भी ऐसी कि इसे भगवान शंकर की मूल बारात का स्वरूप देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती। इसमें भूत-प्रेत, मदारी, जादूगर, बैल, ऊंट, हाथी, घोड़ा आदि तो रहते ही हैं, साथ में सबसे बड़ा आकर्षण शिव व पार्वती वेशधारी होते हैं। यह इस देश और काशी की अनोखी गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल है। इसमें शुरू से ही शिव स्वरूप एक हिंदू होता है तो माता पार्वती का स्वरूप धारण करने का अधिकार मुस्लिम को मिलता है। प्रस्तुत है शिव बारात को निकालने वाले, संस्थापकों में से एक दिलीप सिंह सिसोदिया से पत्रिका की खास बातचीत।
सिसोदिया ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि 1983 में जब श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से सोना चोरी हुआ था, तब समूची काशी सड़कों पर उतर आई थी। गजब का गुस्सा था। तभी महाशिवरात्रि का पर्व आया तो हम लोगों ने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाए जिससे शासन-प्रशासन पर दबाव बने। ऐसे में प्रसिद्ध साहित्याकर व अधिवक्ता पंडित धर्मशील चतुर्वेदी, प्रमुख व्यवसायी केके आनंद, कैलाश केशरी, वरिष्ठ पत्रकार स्व. सुशील त्रिपाठी व अमिताभ भट्टाचार्या से मैने शिव बारात निकालने की चर्चा की। सभी ने इसकी योजना की तारीफ की और इसकी तैयारी शुरू कर दी गई। सबसे बड़ी बात कि य तय किया गया कि इस आयोजन के लिए किसी से एक पैसा भी चंदा नहीं लिया जाएगा। इसी तैयारी के बीच एक संकट आया कि शिवलिंग कहां से आएगा और उसे कौन बनाएगा। इस पर धर्मशील जी ने मो. इकराम खां जो समाजसेवी भी थे और बेहतरीन कलाकार भी। हम लोग खां साहब के पास प्रस्ताव ले कर गए तो उन्होंने थोड़ी देर सोचने के बाद इस चुनौतीपूर्ण कार्य को स्वीकार कर लिया। सिसोदिया ने बताया कि तब बनारस में काले पंखे का रोजगार शबाब पर था। ऐसे में खां साहब ने पंखे की जाली से अरघा बनाया और पीछे वाले भाग जिसमें मशीन होती है उसे मिला कर शिवलिंग तैयार कर दिया। 1983 से 1998 यानी 15 साल तक वही शिवलिंग शिव बारात में प्रमुखता से शामिल किया जाता था। उसके बाद तांबे की शिव प्रतिमा बनवाई गई और अब उस प्रतिमा को ही हर साल बारात में निकाला जाता है।
उन्होंने बताया कि जैसे भगवान शंकर आदि देव हैं वैसे ही उनकी काशी भी अनादि है। माना जाता है कि जब शंकर थे तब न कोई धर्म था न जाति फिर काहे का हिंदू मुस्लिम। तब तो स्वजन और दुर्जन ही हुआ करते थे। एक जो धार्मिक प्रवृत्ति का होता था वह स्वजन और जो धार्मिक कृत्य में अड़ंगा डाले वह दुर्जन। उसी सोच के तहत शिव बारात में शिव स्वरूप में हिंदू और पार्वती स्वरूप में मुस्लिम को शामिल किया जाता है। शुरू से ही पंडित धर्मशील चतुर्वेदी शिव स्वरूप में होते थे जबकि रणजी खिलाड़ी जावेद अख्तर पार्वती स्वरूप में और काशी हास्य कवियों में शुमार सांढ बनारसी सहबल्ला बनते रहे। दो साल पहले धर्मशील जी के तिरोधान के बाद सांढ बनारसी को दूल्हा बनाया जाने लगा। इस वर्ष भी वही शिव स्वरूप में होंगे जबकि मशहूर व्यवसायी बदरुद्दीन भाई पार्वती स्वरूप। उन्होंने बताया कि एक अन्य खास बात कि इस बारत में शिव बारात में मुस्लिम महिलाएं उत्साह के साथ आरती उतारती हैं।
दिलीप सिंह ने बताया कि 1983 से पहले इस देश में कोई शिव बारात नहीं निकलती थी। महाशिवरात्रि पर लोग गंगा स्नान और बाबा विश्वनाथ सहित अन्य शिवालयों में दर्शन-पूजन कर लेते थे। यह पहला उत्सव बारात के रूप में शुरू हुआ और अब यह दुनिया भर में विख्यात हो गया है। पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और मलयेशिया, मारिशस में धूम-धाम से शिव बारात निकाली जाती है।
बताया कि इस तरह की शोभा यात्रा हो या कोई उत्सव उसकी कोई अलग से थीम नहीं होती पर शिव बारात हर साल तात्कालिक मुद्दों पर आधारित थीम पर आधारित होती है, हर साल एक नया संदेश दिया जाता है। देश काल की घटनाओं को प्रमुखता दी जाती है। इस बार बनारस की मस्ती को थीम बनाया गया है। इसके पीछे सोच यह है कि आम जनता नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई आदि से त्रस्त है तो हम लोग होलियाना मूड में निकलेंगे, ब्रज और बरसाने की होली की मस्ती होती तो बनारसी फगुआ का रंग भी दिखेगा। इससे पहले कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में, ” अयोध्या, मथुरा, काशी तीनों कन्या नाशी..”, बनारस को लेकर पुरानी कहावत रांण, सांढ, सन्यासी इनसे बचे तो सेवे काशी की पैरोडी बनाई गई थी, ”खादी, खाकी, ट्रैफिक और अपराधी इनसे बचे तो सेवे काशी” जैसे संदेशों को फोकस किया गया था।
उन्होंने बताया कि हर साल महामृत्युंजय मंदिर से यह शिव बारात निकलती है और मैदागिन, नीचीबाग, बुलानाला, चौका, बांसफाटक, गोदौलिया होते चितरंजन पार्क तक जाती है। वहां दशाश्वमेध व्यवसायी संघ की ओर से सभी बारातियों का ठंडई से स्वागत किया जाता है। बारात शाम सात बजे निकलती है और रात करीब 11 बजे इसका समापन होता है। इस बार 13 फरवरी की शाम बारात निकलेगी।