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एसएनसीयू में बेहतर इलाज के लिए मांगे वेंटिलेटर

एसएनसीयू में बेहतर इलाज के लिए मांगे वेंटिलेटरचिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने नहीं भेजे- जिला अस्पताल ने अपने स्तर पर खरीद करने की थी कार्यवाही, नहीं दी अनुमतिहनुमानगढ़. जिले में मेडिकल कॉलेज शुरू हो चुका है। अब सरकारी कागजों में हनुमानगढ़ में मेडिकल कॉलेज संचालित है।

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एसएनसीयू में बेहतर इलाज के लिए मांगे वेंटिलेटर,
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने नहीं भेजे
– जिला अस्पताल ने अपने स्तर पर खरीद करने की थी कार्यवाही, नहीं दी अनुमति
हनुमानगढ़. जिले में मेडिकल कॉलेज शुरू हो चुका है। अब सरकारी कागजों में हनुमानगढ़ में मेडिकल कॉलेज संचालित है। लेकिन जिला अस्पताल की एसएनसीयू के लिए राज्य सरकार ने वेंटिलेटर की सप्लाई अभी तक नहीं की है। उधर, जिला अस्पताल प्रशासन ने नवजात को बेहतर इलाज देने के लिए अपने स्तर पर वेंटिलेटर खरीद की कार्यवाही कर अनुमति लेने के लिए फाइल जयपुर भेजी थी। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग निदेशालय में यह फाइल धूल फांक रही है। इस संबंध में अस्पताल प्रशासन ने रिमांडर भी भेज दिया है। इसके बावजूद इसकी खरीद करने के लिए हरी झंडी नहीं दी जा रही। इसकी वजह से गंभीर स्थिति होने पर नवजात को हायर सेंटर में रैफर किया जाता है। हायर सेंटर पहुंचने में समय काफी लगता है, इसलिए परिजन मजबूरन नवजात को प्राइवेट शिशु अस्पतालों में भर्ती करवाते हैं। आरएमआरएस से करनी थी खरीद जिला अस्पताल प्रशासन ने अपने मद राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी से बीस लाख रुपए की लागत से वेंटिलेटर खरीद करने की कार्यवाही भी पूरी कर ली। संबंधित कंपनी से इसकी सप्लाई लेने के लिए फाइल चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग निदेशालय को भेजे हुए छह माह के करीब हो गए। लेकिन आज तक विभाग की ओर से इसकी अनुमति जारी नहीं की गई। जबकि अस्पताल प्रशासन इसके लिए रिमांडर भेजकर भी आग्रह कर चुका है। टॉप 5 में शामिल जिला अस्पताल एसएनसीयू प्रदेश की टॉप 5 में शामिल है। दरअसल अस्पताल की टीम की ओर से नवजात की बेहतर देखभाल करने व चिकित्सकों की ओर से बेहतर इलाज करने से गत वर्षों की तुलना के दौरान मृत्यु दर में काफी कमी आई है। इसके चलते जिला अस्पताल की एनएसयूआई प्रदेश के अस्पतालों में टॉप -5 पर पहुंच गई है। इसके बावजूद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग न तो खुद के स्तर पर वेंटिलेटर की सप्लाई दे रहा है और न ही अस्पताल प्रशासन को खरीदने दे रहा है। वेंटिलेटर की सुविधा होने से रैफर के केसों की संख्या में कमी आएगी और महानगरों के अस्पतालों के तर्ज पर नवजात व बच्चों को इसी अस्पताल में इलाज मिल सकेगा। यह है मामला जिला अस्पताल प्रशासन ने भी शिुश वार्ड में वेंटिलेटर की खरीद की कागजी कार्यवाही पूरी करते हुए कई माह पहले अनुमति लेने के लिए फाइल जयपुर भिजवाई थी। वेंटिलेटर की सप्लाई श्रीगंगानगर की कंपनी से की जानी है। जिला अस्पताल प्रशासन ने आरएमआरएस की बैठक में दो वेंटिलेटर खरीदने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन बैठक में एक ही मशीन खरीदने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके तहत यह मशीन खरीदने की कार्यवाही की गई थी। उधर, निदेशालय स्वास्थ्य विभाग ने जिला अस्पताल प्रशासन से स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार करने के लिए उपकरणों की कमी के बारे में जानकारी मांगी गई थी। इसके जरिए जिला अस्पताल प्रशासन ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग निदेशालय से पांच वेंटिलेटर की डिमांड की थी। लेकिन अभी तक वेंटिलेटर की सप्लाई नहीं दी। मृत्यु दर में आएगी कमी एक वेंटिलेटर से एक समय में एक शिशु का इलाज किया जा सकता है। ऐसे में अन्य शिशु को भर्ती करने की बजाए, रैफर किया जाएगा। यह वेंटिलेटर खराब हो जाता है तो ऐसे में शिशु को आनन-फानन में रैफर करने का एक मात्र विकल्प होगा। इसके आधार पर जिला अस्पताल प्रशासन ने शिशु वार्ड के लिए पांच वेंटिलेटर की डिमांड भेजी थी। हैरत की बात है कि अस्पताल प्रशासन ने कोविड के समय शिशु वार्ड के लिए पांच वेटिलेटर की डिमांड राज्य सरकार को भेजी थी। इस संबंध में निदेशालय ने कोई संज्ञान नहीं लिया। यह है व्यवस्था वर्तमान में एनआईसीयू में केवल सीपेप की सुविधा की है। इस सीपेप के जरिए प्रेशर से नवजात को ऑक्सीजन दी जाती है। नवजात स्वत: ऑक्सीजन लेने में सक्षम नहीं होने पर वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है। यही स्थिति जिला अस्पताल के बच्चा वार्ड की है। बच्चा वार्ड में भी वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है। जिले के प्राइवेट अस्पतालों में यह सुविधा केवल एक या दो अस्पताल में ही है। लेकिन चिकित्सा विभाग ने अभी तक न तो वेंटिलेटर की सप्लाई दी है और न ही खरीद करने की अनुमति।