
सविता व्यास
जयपुर। जीवन के दुख-सुख इंसान को एक-दूसरे के करीब लाते हैं, लेकिन जयपुर के 75 वर्षीय गोरधनदास केसवानी ने इन पलों को मानवता की मिसाल बना दिया। पिछले 30 सालों से वे संवेदना पत्र लिखकर शोकाकुल परिवारों के दर्द को बांट रहे हैं। अब तक 2.80 लाख से अधिक हस्तलिखित संवेदना पत्र लिख चुके केसवानी का यह सेवा भाव लिम्का बुक ऑफ रिकॉड्र्स और ऑक्सफोर्ड बुक ऑफ रिकॉड्र्स में दर्ज हो चुका है। उनकी यह यात्रा 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद शुरू हुई, जब उन्होंने सोनिया गांधी को पहला संवेदना पत्र लिखा। यहीं से यह संकल्प उनके जीवन का हिस्सा बन गया।
संवेदना का हस्तलिखित स्पर्श
आज के डिजिटल युग में, जहां लोग व्हाट्सएप मैसेज या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए संवेदना व्यक्त करते हैं, केसवानी का तरीका अनूठा है। हर पत्र को वे पूरे मन से लिखते हैं, जिसमें व्यक्तिगत भावनाएं और संवेदना का गहरा स्पर्श होता है। वे खुद पत्र टाइप करते, प्रिंट करते और जयपुर के दुर्गापुरा, महावीर नगर, मॉडल टाउन, मालवीय नगर जैसे इलाकों में घर-घर जाकर पहुंचाते हैं। दूर-दराज के परिवारों तक डाक के जरिए उनकी संवेदना पहुंचती है। साथ ही, वे गंगाजल भेंट कर शोक संतप्त परिवारों को सांत्वना प्रदान करते हैं। केसवानी कहते हैं, ‘यह काम मेरे लिए पूजा है। जब तक सांस है, मैं दुख की घड़ी में लोगों के साथ खड़ा रहूंगा।’
18 साल से लावारिस शवों का अस्थि विसर्जन
केसवानी का सेवा भाव केवल पत्रों तक सीमित नहीं। पिछले 18 सालों से वे लावारिस और निराश्रित शवों की अस्थियों को हरिद्वार ले जाकर गंगा में विसर्जित करते हैं। अब तक वे 11 हजार से अधिक अस्थि कलशों को अंतिम विदाई दे चुके हैं। श्राद्ध पक्ष में वे तर्पण भी करवाते हैं, ताकि इन आत्माओं को शांति मिले। इस नेक कार्य में उनके सहयोगी सुरेंद्र कुमार, राजकुमार सेवानी, रमेश अप्पूजानी और राजेश जोशी कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते हैं।
75 साल में भी केसवानी का जज्बा अटूट
75 साल की उम्र में भी केसवानी का जज्बा अटूट है। वे कहते हैं, ‘संवेदना बांटना और लावारिस अस्थियों को सम्मान देना मेरे जीवन का मकसद है।’ उनका यह समर्पण न केवल जयपुर, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है। गोरधनदास केसवानी जैसे लोग साबित करते हैं कि मानवता का धर्म ही सबसे बड़ा धर्म है।