एम आई जाहिर / जोधपुर ( jodhpur news.current news ).मारवाड़ या अन्य कहीं के गांवों में ( Basant Panchami in the villages ) बसंत पंचमी ( Basant Panchami festival ) का स्वरूप कुछ अलग था। जैसे कि अन्य कई त्यौंहारों की तरह तब यह पर्व पीताम्बर से ना जुड़ा होकर हमारी फसलों से जुड़ा था, सामाजिक सदभाव से जुड़ा था। बसंत पंचमी 2020 ( Basant Panch 2020 ) पर राजस्थानी भाषा की प्रतिष्ठित साहित्यकार ( Rajasthani language litterateur ) किरण राजपुरोहित नितिला ( Kiran Rajpurohit Nitila ) ने पत्रिका से एक मुलाकात में यह बात कही।
उन्होंने बताया कि गांवों की कुछ साठ या सत्तर साल पहले की बसंत पंचमी ( Basant Panchami ) के दिन ढोली और ढोलण जी के बिना नहीं मनाई जाती थी। बसंत पंचमी पर्व ( Basant Panchami news ) के दिन गेहूं के खेतों से उंबियां या गेहूं की बाली समेत पौधों को उखाड़ कर बाथ या भारा बांध कर लाया जाता था। गांव के चौंहटै या पौळ में ढोली-ढोलण जी इस भारे को लेकर ढोल थाली बजाते ‘बधावा’ गीत गाते हुए आते थे। पौळ के हर द्वार-ड्यौढ़ी जाकर गीत गाते थे। तब वो धिराणी या गृहिणी उनको त्यौंहारी ‘ बाजरी,गेहूं आदि’ उसकी झोली में डालती थी।
नितिला ने बताया कि अपनी उसी झोली में से कुछ आखे ‘अक्षत,गेहूं’ और चार-पांच उंबियां उनके पल्ले में डालते थे। बदले में धिराणी उनको भोजन करा कर, सीख ‘रुपये ‘ देकर विदा करती थी। ये अक्षत और कुछ उंबियां माताजी के आले या भगवान के आले में साल भर रहती थी। कुछ उंबियों को साफे या पोतिया में ‘तुर्रा’ की तरह भी धारण किया जाता था।
उन्होंने कहा कि जिस प्रेम और सदभाव से ये त्यौंहार सम्पन्न होता है, यह बड़ी बात है। मानवीयता की पराकाष्ठा था जिससे हमें आज सीखना है। इस त्यौंहार को हम पीताम्बरी रूप के साथ इस पहलू को भी शामिल करें तो क्या ही अच्छा हो। शहर में वही गांवपन ला पायें तो बहुत कुछ खोया हुआ वापिस पा सकते हैं। फसल को धरती का सबसे सुंदर रूप माना जाता है। इसी से तो सृष्टि का पालन होता है। इसी कारण अधिकतर त्यौंहार पूरे भारत में फसलों से सम्बंधित है।