नागौर. राज्य स्तरीय रामदेव पशु मेला मैदान का महीनों से पसरा सन्नाटा अब टूटने लगा है। जहां कुछ दिन पहले तक खाली मैदान और उड़ती धूल नजर आ रही थी, वहां अब पशुओं की घंटियों की गूंज के साथ पशुपालकों की आवाजाही और टेंटों की कतारें लगने से माहौल बदलने लगा हैं। मेला शुरू होने के दूसरे दिन तक कुल 751 पशु मेला परिसर में पहुंच चुके हैं। हालांकि यह संख्या अभी शुरुआती दौर मानी जा रही है, लेकिन पिछले वर्ष की तुलना में इस बार आवक की रफ्तार कुछ धीमी नजर आ रही है। बताते हैं कि गत वर्ष यह संख्या पहले दिन हजार के करीब पहुंच गई थी। हालांकि मेला अधिकारियों का कहना है कि अभी तो आवक शुरू हुई है, उम्मीद है कि और भी पशुपालक अपने पशुओं के साथ आएंगे।
ऊंट वंश सबसे आगे, गोवंश दूसरे स्थान पर
मेले में अब तक पहुंचे पशुओं में ऊंट वंश की संख्या सबसे अधिक रही है। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार ऊंट वंश के 375 पशु मेला परिसर में दर्ज किए गए हैं। गोवंश दूसरे स्थान पर रहा, जिनकी संख्या 362 रही। अश्व वंश के 9 पशु और भैंस वंश के 5 पशु अब तक मेले में पहुंचे हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि मेला अब आकार लेने लगा है, लेकिन वह रौनक अभी नहीं आई है, जिसके लिए यह मेला जाना जाता है।
पिछले साल से कम संख्या, प्रशासन को आगे बढ़ोतरी की उम्मीद
गत वर्ष मेले के इसी चरण तक करीब एक हजार पशु पहुंच चुके थे, जबकि इस बार यह आंकड़ा 751 पर है। मेला प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अभी पशुओं की आवक की शुरुआत भर हुई है। आने वाले दिनों में यह संख्या तेजी से बढ़ेगी और अंतिम चरण में बड़ी संख्या में पशुपालक अपने पशुओं के साथ मेले में पहुंचेंगे।
परिवहन की दिक्कतों ने बढ़ाई पशुपालकों की चिंता
पशुपालकों की चिंता प्रशासन की उम्मीदों से अलग तस्वीर पेश कर रही है। गोवंश पालक भंवरलाल जाट का कहना है कि नागौरी बैलों की मांग आज भी दूसरे राज्यों में काफी ज्यादा है, लेकिन खरीद-फरोख्त के बाद पशुओं को ले जाना सबसे बड़ी समस्या बन गया है। रास्तों में बार-बार वाहनों को रोका जाना और अनावश्यक परेशान किया जाना कई पशुपालकों को मेले से दूर कर रहा है। ऊंट लेकर पहुंचे पशुपालक इस्माइल खान बताते हैं कि पहले दिन मैदान में अच्छी हलचल दिखी थी, लेकिन दूसरे दिन वह रौनक नजर नहीं आई। उनका कहना है कि ऊंट पालक तो किसी तरह पहुंच रहे हैं, लेकिन गोवंश पालक परिवहन के डर से पीछे हट रहे हैं। पशुपालक रामनारायण सारण का कहना है कि नागौरी बैलों की पहचान देशभर में है। इसके बावजूद हर बार खरीदारों के साथ पशुओं को ले जाने में जो दिक्कतें आती हैं, उससे पशुपालक हतोत्साहित हो चुके हैं। यही वजह है कि मेला शुरू होने के बावजूद मैदान अभी पूरी तरह अपने रंग में नहीं आ पाया है।
टेंटों की कतारों से बसने लगा अस्थायी गांव
पशुओं के साथ आने वाले पशुपालकों के टेंटों के गडऩे के साथ अब मेला मैदान का माहौल तेजी से बदलने लगा है। मैदान में पशुओं की देखरेख के साथ ही खुद का भोजन तैयार करते पशुपालकों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो यहां एक छोटा सा गांव बस गया हो। कहीं चूल्हों पर रोटियां सिक रही हैं, तो कहीं चाय की केतलियां चढ़ी हैं। बच्चों और महिलाओं की मौजूदगी ने भी मैदान में जीवन का रंग घोल दिया है। यह दृश्य साफ करता है कि मेला अब केवल पशुओं का नहीं, बल्कि पशुपालकों के पूरे जीवन का अस्थायी ठिकाना बन चुका है।
अभी बाकी है मेले का पूरा रंग
फिलहाल मेला मैदान में हलचल बढऩे लगी है और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में पशुओं की संख्या में इजाफा होगा। राज्य स्तरीय पहचान रखने वाले इस मेले की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पशुपालकों की परिवहन से जुड़ी समस्याओं का समाधान कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से किया जाता है। तभी यह मेला अपने पूरे रंग, रौनक और पहचान के साथ नजर आ सकेगा।
अभी तो आवक तेज हुई है, और भी आएंगे पशु
रामदेव पशु मेला मैदान में अभी तो पशुओं की आवक शुरू हुई है। दूसरे दिन तक साढ़े 7 सौ से ज्यादा पशु पहुंच चुके हैं। पूरी उम्मीद है कि पशुपालक अपने पशुओं के साथ खासी संख्या में आएंगे, और पशुओं की खरीद के बाद उनके परिवहन के लिए पहले से ही आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जा चुके हैं। इस बार पूरी उम्मीद है कि पशुपालकों को पशुओं के परिवहन के दौरान कोई परेशानी नहीं आएगी।
डॉ. महेश कुमार मीणा, मेला प्रभारी एवं संयुक्त निदेशक पशुपालक विभाग नागौर