नागौर. जिला मुख्यालय के कृषि अनुसंधान उप केन्द्र(एआरएस) में इन दिनों किनोवा की 12 नई किस्मों पर अनुसंधान चल रहा है। नागौर एआरएस में पहली बार किए जा रहे अनुसंधान के तहत उगाए गए किनोवा के पौधों को देखकर यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में नगौर के किसानों के लिए यह विदेशी फसल फायदे का सौदा बनेगी। सुपर फूड के नाम से जानी जाने वाली यह फसल खारे में भी अच्छी होती है। खास बात यह है कि इस फसल में न तो कोई रोग लगता है और न ही अधिक सर्दी पडऩे पर पाले का असर होता है। कृषि वैज्ञानिको के अनुसार किनोवा में मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता है। प्रति बीघा 3 से 4 क्विंटल उत्पादन के साथ बाजार में भाव भी ठीक मिलने का दावा एआरएस के कृषि वैज्ञानिकों ने किया है।
गौरतलब है कि पश्चिमी में कम बारिश और सूखा पडऩा आम है, जिसके चलते जल स्तर भी नीचे चला गया है। ज्यादा गहराई से पानी निकालने पर खारा पानी आता है, जिससे सामान्य फसलें होती नहीं। किनोवा रबी की फसल होने के कारण नागौर जिले में इसे केवल सिंचाई के माध्यम से ही उगाया जा सकता है, ऐसे में किसानों के लिए यह उपयोगी साबित हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि किनोवा अपने देश के लिए नई फसल है और जलवायु परिवर्तन के दौर में यह बेहद लाभकारी सिद्ध हो रही है। इसकी खेती कर कई किसान लाभ कमा रहे हैं।
सुपर फूड की श्रेणी में शामिल
किनोवा के बेहद पौष्टिकारक बीज चावल, गेहूं और सूजी की तरह अनाज के रूप में इस्तेमाल होते हैं। इसमें काफी मात्रा में पोटैशियम, मैग्नीशियम, प्रोटीन, फाइबर और विटामिन बी पाया जाता है। इसके चमत्कारी गुणों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे पौष्टिक अनाजों की श्रेणी में शामिल किया है। किनोवा सुपरफूड और जलवायु प्रतिरोधी होने के साथ कम लागत में ज्यादा मुनाफा देनी वाली फसल के रूप में अपनी पहचान बना रही है। इसकी खेती अपने देश के किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है।
बाजार में मिलती है अच्छी कीमत
दरअसल, किनोवा फसल का वानस्पतिक नाम ‘चिनोपोडियमक्विनवा’ है। भारत में इसकी खेती बहुत कम होती है। कृषि महाविद्यालय नागौर के डॉ. सौरभ जोशी ने बताया कि किनोवा के 45 फिल्ड नागौर जिले के विभिन्न प्रगतिशील किसानों को दिए हैं। जिन किसानों ने किनोवा की खेती की है, वे फसल की वृद्धि देखकर बेहद खुश हैं। उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले वर्षों में और भी किसान किनोवा की खेती करेंगे। किनोवा की खरीद के लिए कम्पनी ने किसानों से सीधी बात की है और जैसे ही फसल तैयार होगी, कम्पनी खरीद लेगी। ऐसे में किसानों को बेचने की टेंशन भी नहीं रहेगी। जैसे-जैसे इसे उपजाने वाले किसान बढ़ेंगे, जाहिर है इसकी मार्केट बढ़ेगी, क्योंकि बेहद आसान खेती वाली इस फसल की उपज का अंतरराष्ट्रीय भाव अच्छा है। इसका उपयोग नाश्ते में, भोजन में पॉपकॉर्न की तरह, आटे के रूप में, सलाद और ब्रेड, नूडल्स और पास्ता बनाने के लिए किया जाता है। इसके बीजों को अंकुरित करके खाया जा सकता है।
किनोवा खेती के कई फायदे
कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि किनोवा आनुवंशिक विविधता से समृद्ध होने के कारण इसे न केवल विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है, बल्कि कम उपजाऊ ऊसर भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। खेती के लिए पानी की कमी नागौर सहित पश्चिमी राजस्थान एक मुख्य चुनौती है, ऐसे में किनोवा की खेती सबसे ज्यादा उपयुक्त है।
ग्लूटेन-मुक्त आहार है किनोवा
एआरएस के कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि किनोवा खाने से कुपोषण की समस्या कम होगी। किनोवा का खाने में उपयोग करके ब्लड शुगर को कम किया जा सकता है। यह ऑक्सीडेटिव तनाव को भी कम कर सकता है। कोलेस्ट्रॉल को भी कम करने में मदद कर सकता है। यह ग्लूटेन-मुक्त आहार का एक अच्छा विकल्प हो सकता है। वजन कम करने में मदद कर सकता है और सूजन को भी कम कर सकता है।
12 किस्मों पर अनुसंधान
कृषि अनुसंधान केंद्र नागौर में कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के अनुसंधान प्रोजेक्ट के माध्यम से नागौर रीजन के लिए किनोवा की 12 नई किस्म पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। इसमें जल्दी पकने वाली तथा अन्य गुणवत्ता वाली किस्म का अनुसंधान खारे पानी में किया जा रहा है। नई किस्म के माध्यम से अधिक उपज तथा अधिक गुणवत्ता वाली किनोवा की नई किस्म का उत्पादन किया जाएगा।
– डॉ. राजदीप मुंदियाड़ा, कृषि वैज्ञानिक, कृषि अनुसंधान उप केंद्र, नागौर