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VIDEO : कोटड़ा से कुंभलगढ़ के सीताफल की मिठास महाराष्ट्र से दिल्ली तक
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VIDEO : कोटड़ा से कुंभलगढ़ के सीताफल की मिठास महाराष्ट्र से दिल्ली तक

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उदयपुर. कोटड़ा से कुंभलगढ़ के जंगलों में सीताफल की बहार आई हुई, इनकी मिठास की महक उदयपुर ही नहीं कई शहरों से राजधानी दिल्ली तक पहुंची हुई है। बड़ी मात्रा में सीताफल इन जंगलों से बाहर भेजा जा रहा है जिसका स्वाद लोग ले रहे है तो आइसक्रीम बनाने वाली कंपनियों की भी मांग बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के तहत करीब 1200 मेट्रिक टन सीताफल विक्रय के लिए विक्रय के लिए बाहर जाते है।
उदयपुर के देवला, गोगुंदा, सायरा, राजसमंद के कुंभलगढ़ व चित्तौडग़ढ़ जिले में प्रचुर मात्रा में सीताफल होते है। दशहरा-दीपावली के समय अक्टूबर-नवंबर महीने में पेड़ पर फल आते है और उसे आदिवासी संग्रहण कर बेचते है। उदयपुर जिले में प्रचुर मात्रा में सीताफल कोटड़ा ब्लॉक के देवला में होते है, वन विभाग की सर्वे के अनुसार करीब 12000 मेट्रिक टन सीताफल विक्रय के लिए गुजरात, महाराष्ट्र व दिल्ली जाते है।

फल पर आंख आई मतलब तोड़ सकते
आदिवासियों का मानना है कि जब कच्चे सीताफल पर आंख सी दिख जाती है मलतब कि उसे अब तोड़ा जा सकता है। वैसे पक्का हुआ फल जल्दी खराब हो जाता है इसलिए आंख आते ही फल को तोड़ लिया जाता है। आदिवासी यहां आने वाले व्यापारियों को बेचते है, फल संग्रहण के कार्य में महिला-पुरुष व बच्चे लगते है। पौराणिक विवंदतियों में कहा गया है कि सीता को यह फल बहुत पसंद था, राम जंगल से यह फल लाकर सीता को देते थे, इसलिए इसका सीताफल नाम दिया गया।

अतिरिक्त आय भी उपलब्ध करवा रहे
उप वन संरक्षक ओमप्रकाश शर्मा बताते है कि वन मंडल उत्तर ने जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग व मेडिशनल प्लांट्स बोर्ड के सहयोग से निर्मित प्रंसस्करण केन्द्र झाड़ोली, डांग, खीला, क्यारी व देवला पर स्वयं सेवी संस्था ग्रामश्रीे व सृजन के साथ सीताफल का पल्प निष्कर्षण के द्वारा मूल्य संवर्धन कर मुख्यत: आदिवासी महिलाओं को अतिरिक्त आय उपलब्ध कराई जा रही है।

पल्प आइसक्रीम, मिठाई में काम आता
शर्मा बताते है कि इन केन्द्रों पर करीब 200 महिलाएं पल्प व बीज निकालने में तो 1000 महिला-पुरुष व बच्चे सीताफल संग्रहण करने में लगे है। पल्प का वर्ष पर्यन्त शादी व अन्य समारोह, दैनिक जीवन में मिठाई, रबड़ी, आइसक्रीम बनाने में काम आता है, बीज भी करीब 30 से 50 रुपए किलो के भाव से बिकता है।