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27 नवंबर को पद्मभूषण हरिवंश राय बच्चन की जयंती है। हालांकि उन्होंने कई स्तरीय रचनाएं की, लेकिन उन्हें अमर बनाया उनकी काव्य कृति ‘मधुशाला’ ने। इसके जरिये डॉ. बच्चन ने जीवन में कामयाबी का ऐसा मंत्र दिया है, जो अद्भुत है। इस अकाट्य सूत्र को अपनाकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल कर तरक्की की राह पर निकल सकता है।
किसी भी एक काम में सिद्धहस्त बनो
‘राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला...’ उनकी इस पंक्ति में सफलता का उद्घोष है तो असीम उत्साह भी, जो हर किसी में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और बताता है कि मंजिल की ओर बढऩे के लिए किसी एक रास्ते पर चलना जरूरी है। अगर कुआं खोदना है तो एक ही जगह गहरा गड्ढ़ा करना होगा, न कि कई जगह थोड़ा-थोड़ा। इससे परिश्रम का अपव्यय होगा और नतीजा भी नहीं मिलेगा।
मत डरो, बार-बार प्रयास करो
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर...’ को लेखनीबद्ध कर मानवीय जीवन में दर्द और विषमताओं से पिल पडऩे का संदेश देने वाले बच्चन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘जीवन के मारे हुओं के प्रति मेरे मन में संवेदना भले ही हो, प्रशंसक हूं मैं जीवन से जूझने वालों का ही।’ ऐसी सकारात्मक सोच को प्राय: अपने सृजन से उजागर करने वाले बच्चन की ‘मधुशाला’ को देखें तो इसकी रूबाइयां जीवन में चुनौतियों से लोहा लेकर सफल होने की प्रेरणा देती है और विफलता से डरे बिना बार-बार प्रयास करने का आह्वान करती है।
लक्ष्य पर टिकी रहे निगाहें
‘हर सूरत साकी की सूरत, मैं परिवर्तित हो जाती हूं, आंखों के आगे हो कुछ भी, आंंखों में है मधुशाला’ के जरिए बच्चन अर्जुन की मानिंद केवल और केवल मात्र लक्ष्य पर निगाहें केन्द्रित रखने की अहमियत बता गए है। हम इस सत्य से मुखातिब होते हंै कि जीवन में कोई भी मुकाम हासिल करने के लिए स्वयं को दिखाई देने वाले पथ से अलग कोई और रास्ता श्रेष्ठ नहीं हो सकता।
असमंजस-संशय सब छूमंतर
‘मदिरालय जाने को घर से चलता है पीने वाला, किस पथ से जाऊं असमंजस में है वो भोलाभाला’ में मंजिल की ओर कूच करने वाले लोगों की मनोदशा का चित्रण है। लक्ष्य की तलाश में आगे बढ़ते पथिक को मार्ग में तरह-तरह के लोग मिलते हैं, जो अपने-अपने तरीके से आगे बढऩे की सीख देते हैं। पथिक उपलब्ध विकल्पों में से किसे चुने और किसे नहीं की ऊहापोह में उलझकर भ्रमित हो जाता है। संशय के इस माहौल में ‘अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूं, राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला’- कहकर डॉ. बच्चन असमंजस, ऊहापोह और संशय छोड़ चलने की सलाह देते हैं।
अपनी आत्मकथा लिखा है
काली से काली रात का भी प्रभात होता है। समय चक्र जैसे सौभाग्य की, वैसे ही दुर्भाग्य की जमीन पर होता हुआ आगे निकल जाता है।
Published on:
23 Nov 2017 11:39 am
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