24 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Gen Z का बालेन शाह से मोह भंग! महज 150 दिन में कैसे फीकी हो गई नेपाल के पीएम की चमक?

Balen Shah And Gen Z: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सत्ता में 150 दिन पूरे कर लिए हैं, लेकिन इस दौरान उनकी लोकप्रियता पर सवाल उठे हैं। युवाओं के समर्थन से सत्ता तक पहुंचे शाह के खिलाफ अब सड़क से संसद तक विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं।
5 min read
Google source verification
Balen Shah

बालेन शाह। फोटो सोर्स- ANI

Balen Shah And Gen Z: जेन जी की लहर पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचने वाले बालेन्द्र ‘बालेन’ शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर अपने 150 दिन पूरे कर लिए। हालांकि, इन 150 दिनों में उनकी छवि मजबूत होने के बजाए कमजोर होती नजर आई है। नेपाल का युवा वर्ग बालेन से काफी ज्यादा प्रभावित था, इसलिए जब जेन जी लहर उठी, तो बालेन सबसे सशक्त नेता के तौर पर सामने आए। मार्च में नेपाल में चुनाव हुए थे। पूर्व रैपर, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह ने चार बार प्रधानमंत्री रहे केपी शर्मा ओली को उनके अपने गढ़ ‘झापा’ में शिकस्त दी। उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) 27 मार्च, 2026 को बहुमत के साथ सत्ता में आई।  

सड़क से संसद तक विरोध

ऐसे युवा मतदाता, जो पूर्व की सरकारों से कभी जुड़ाव महसूस नहीं कर पाए, उन्हें बालेन शाह में एक ऐसे प्रधानमंत्री की झलक नजर आई, जो एनर्जी से भरपूर है, देश को बदलने की इच्छा रखता है और जिसका मकसद केवल सत्ता सुख भोगना नहीं है। बालेन युवाओं के लिए एक आदर्श बने, लेकिन वक्त के साथ-साथ उनकी यह छवि कमजोर होती चली गई। खासकर, जुलाई आते-आते वही पीढ़ी, जो उन्हें सत्ता तक लेकर गई थी, काठमांडू की सड़कों पर फिर उतर आई और उनके इस्तीफे की मांग करने लगी। हालांकि, बालेन को सबसे ज्यादा खतरा सड़कों पर उतरी भीड़ से नहीं है, बल्कि सरकार में उन्हें लेकर बढ़ रही नाराजगी से है। संसद और यहां तक कि अपनी ही पार्टी से उनकी बढ़ती दूरी ने उनके शासन चलाने के तौर-तरीके पर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही, यह भी सवाल उठने लगा है कि क्या उन्हें सत्ता तक पहुंचाने वाला राजनीतिक गठबंधन अब धीरे-धीरे बिखरने लगा है।

इन घटनाओं से प्रभावित की छवि

इस बदलाव की रफ्तार अपने आप में एक दिलचस्प कहानी बयां करती है। महज पांच महीनों में एक-दूसरे से जुड़ी कई घटनाओं ने बालेन की लोकप्रियता को काफी नुकसान पहुंचाया है। अप्रैल में शाह ने भारतीय बाजारों से लाए जाने वाले सामान पर सीमा शुल्क के सख्त नियम लागू किए,  इससे उन आम नेपाली नागरिकों की रोजमर्रा की खरीदारी प्रभावित हुई, जो दवाइयों, किराने के सामान और घरेलू जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं। इस फैसले से लोगों में बड़े पैमाने पर नाराजगी फैल गई। आखिरकार विरोध-प्रदर्शनों के दबाव में सरकार को जल्द ही अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

जून में बालेन ने मंत्री पद से नीचे के स्तर के विदेशी राजनयिकों के साथ बैठक करने से इनकार कर दिया था। इनमें भारत के विदेश सचिव भी शामिल थे। इससे यह संदेश गया कि सत्ता का नशा बालेन शाह के सिर चढ़ने लगा है। ऐसा देश, जो तमाम तरह की परेशानियों में घिरा है, उसका पीएम देश को सही रास्ते पर ले जाने के बजाए, अपना रुतबा दिखाने में व्यस्त हो जाए, तो जनता में नाराजगी जाहिर है। हालांकि, 10 अगस्त को शाह ने खुद इस नियम को खत्म किया और काठमांडू स्थित सिंह दरबार में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात की।

जुलाई में बालेन सरकार की नाकामियां उस समय भी उजागर हुईं, जब 25 वर्षीय राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली ने महानगर पालिका से जुड़े मुद्दों को लेकर आत्मदाह कर लिया। गणेश नेपाली नगर निगम द्वारा पार्किंग संबंधी जुर्माने की कार्रवाई से नाराज चल रहे थे। उन्होंने विरोध स्वरूप खुद को आग लगा ली और बाद में उनकी मौत हो गई। इसके कुछ ही दिनों के भीतर आत्मदाह की दो और कोशिशें हुईं। अब ये घटनाएं आपस में जुड़ी थीं या नहीं, लेकिन उन्होंने लंबे समय से जमा हो रही कई शिकायतों को एक साथ सामने लाने का काम किया। जैसे नगर प्रशासन की कठोर कार्रवाई, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा का अभाव और इससे यह धारणा पैदा हुई कि बालेन सरकार भी दूसरी सरकारों की तरह है। 

पहली नजर में ये मुद्दे भले ही बहुत बड़े न लगें, लेकिन नेपाल एक छोटा देश है, जिसका आकार लगभग भारत के किसी एक राज्य के बराबर है। ऐसे में मामूली दिखाई देने वाले विवाद भी तेजी से राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बन जाते हैं। काठमांडू के प्रमुख स्थल और विरोध-प्रदर्शनों के केंद्र मैतीघर में फिर से प्रदर्शन शुरू हो गए। जो युवा कभी शाह के समर्थन में जश्न मनाते थे, वही अब हाथों में ऐसे पोस्टर लिए नजर आए, जिनमें सरकार को फासीवादी बताया गया और न्याय की मांग की गई। संसद में विपक्षी सांसदों ने शाह से कहा कि वे काला चश्मा उतारें और जनता का सामना करें।

इसके अलावा, पर्याप्त पुनर्वास के बिना अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर विस्थापित झुग्गीवासियों के समानांतर प्रदर्शनों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया। सरकार ने जांच समिति गठित करने, अधिकारियों को निलंबित करने और मुआवजा पैकेज देने जैसे कदम उठाए, लेकिन तब तक इन घटनाओं की राजनीतिक कीमत सरकार चुका चुकी थी।

जुलाई के आखिर में, दक्षिणी जिलों सुनसरी और सिराहा में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच सांप्रदायिक झड़पों में तीन लोगों की मौत ने भी सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए। हिंसा भारत की सीमा के पास एक बाजार क्षेत्र में उस समय शुरू हुई, जब एक हिंदू जुलूस के दौरान तेज आवाज में संगीत बजाने और धार्मिक झंडे लगाने को लेकर विवाद हो गया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। इसके बाद कर्फ्यू के बावजूद पड़ोसी जिले सिराहा में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक और व्यक्ति की मौत हो गई। अधिकारियों ने कई कस्बों में अनिश्चितकाल के लिए कर्फ्यू लगा दिया। सत्ता में आने के बाद से सार्वजनिक रूप से बेहद कम नजर आए शाह ने प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार बड़ा टेलीविजन संबोधन दिया। उन्होंने लोगों से शांति, धैर्य और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने की अपील की और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया। इस अशांति ने पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रही सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दीं।

भारत का विरोध, अपनों का नाराजगी

शाह ने सत्ता में आने के बाद भारत से रिश्ते सुधारने के बजाए, अपने बयानों से तनाव को बढ़ावा दिया। जो जनता, खसकर युवाओं को पसंद नहीं आया। बालेन शाह की शासन शैली अब सवालों के घेरे में आ चुकी है। सरकार और पार्टी के भीतर भी उन्हें नापसंद करने वाले बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के साथ शाह की सीमित भागीदारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्रधानमंत्री का अपनी पार्टी के साथ तालमेल आखिर कितना मजबूत है और क्या उन्हें सत्ता तक पहुंचाने वाला राजनीतिक गठबंधन में अब दरारें पड़ने लगी हैं। 

नेपाली अंग्रेजी समाचार वेबसाइट MyRepublica की रिपोर्ट के मुताबिक, शाह ने 21 अगस्त को काठमांडू में हुई राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की एक महत्वपूर्ण केंद्रीय समिति की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। बैठक में आगामी स्थानीय स्तर के चुनावों की तैयारियों पर चर्चा होनी थी। इसके बजाए शाह काठमांडू से पोखरा चले गए और बाद में छुट्टियां मनाने के लिए मुस्तांग की यात्रा पर निकल गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 5 मार्च को हुए चुनाव से कुछ दिन पहले पार्टी में शामिल होने के बाद से शाह ने RSP की बैठकों और पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में केवल कभी-कभार ही उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी हालिया गैरमौजूदगी ने सत्तारूढ़ पार्टी के साथ उनके संबंधों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या शाह और RSP अध्यक्ष रबी लामिछाने के बीच संबंधों में तनाव पैदा हो गया है।

बैठकों से भी बनाई दूरी

MyRepublica की रिपोर्ट के अनुसार, RSP के कुछ नेताओं ने तो शाह पर पार्टी की व्यवस्था में ही विश्वास नहीं रखने का आरोप लगाया है। पार्टी के भीतर इस बात को लेकर भी मतभेद सामने आ चुके हैं कि मार्च में बालेन को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर RSP को दो-तिहाई बहुमत दिलाने वाली उस शानदार चुनावी जीत का श्रेय आखिर किसे दिया जाना चाहिए। जिन संस्थानों का नेतृत्व अब बालेन कर रहे हैं, उनसे उनकी दूरी संसद में भी दिखाई दे रही है। संसद में उनकी गैरमौजूदगी अब लगातार विवाद का मुद्दा बनती जा रही है। मार्च में पद संभालने के बाद से शाह संसद की 39 बैठकों में से केवल पांच में ही शामिल हुए हैं।

कुल मिलाकर बालेन शाह को लेकर नेपाली जनता में आक्रोश बढ़ रहा है। उन्हें पसंद करने वालों की संख्या तेजी से नीचे आई है और यह दर्शाता है कि विरोध की लहर पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचना भले ही आसान हो, लेकिन सबको साथ लेकर सरकार चलाना और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं है।

बड़ी खबरें

View All

विदेश

ट्रेंडिंग