-आर्कटिक पर शोध के लिए जा रहे दुनिया के 300 वैज्ञानिकों (300 scientist) में भारत के विष्णु (arctic research)-विष्णु इस जहाज तक नवंबर में ट्रोम्सो के नौर्वेजियन बंदरगाह (tromso norwegian port) से एक रूसी आइसब्रेकर जहाज (russian icebreaker) से वहां पहुंचेंगे। चूंकि उनकी यात्रा धु्रवीय सर्दी के मौसम में शुरू होगी, इसलिए मार्च तक वे सूर्य को नहीं देख पाएंगे
भारत के युवा वैज्ञानिक विष्णुनंदन आर्कटिक पर शोध के लिए जाने वाले 300 वैज्ञानिकों के दल में शामिल हैं। ये दल जर्मनी के मल्टी डिसीप्लीनरी ड्रिफ्टिंग ऑब्जरवेट्री फॉर द स्टडी ऑफ आर्कटिक क्लाइमेट (MOSAIC) अभियान में आर्कटिक की जलवायु का अध्ययन करने के लिए जहाजरूपी वेधशाला में नवंबर से चार महीने तक अध्ययन करेगा। अध्ययन के दौरान ये वैज्ञानिक चार महीने तक सूर्य की रोशनी नहीं देख पाएंगे। वैज्ञानिकों का ये दल जर्मनी के अनुसंधान पोत पोलरस्टर्न पर रहकर अध्ययन करेगा, जो मध्य आर्कटिक में समुद्री बर्फ के बीच लंगर डाले हुए है।
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के रहने वाले 32 वर्षीय धु्रवीय शोधकर्ता विष्णु वैज्ञानिकों के साथ मौसम संबंधी बदलावों पर शोध करेंगे। ‘मोसेइक’ जर्मनी में विल्फ्रेड वेगेनर इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित दुनिया का सबसे बड़ा आर्कटिक अभियान है। पहली बार इतनी बड़ी अवधि के लिए ये शोध दल जा रहा है। पहले सर्दियों में बर्फ की मोटी चादरों के कारण बड़े शोध नहीं हुए।
अभियान का उद्देश्य
‘मोसेइक’ का उद्देश्य आर्कटिक में वायुमंडलीय, महासागरीय और भौतिकी के संभावित कारकों का पता लगाना है, जिनसे परिवर्तन होता है। इन आंकड़ों का प्रयोग मौसम प्रणालियों में बदलावों का सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए किया जाएगा। डॉ. नंदन ने कहा कि एक रडार सुदूर संवेदन विशेषज्ञ के रूप में उनकी भूमिका बर्फ की सतह पर रडार सेंसर लगाने और बर्फ की मोटाई और विविधताओं को मापने का है। नंदन अभी कनाडा के मैनिटोबा विवि में शोध कर रहे हैं।
इसलिए चुना यह समय
इंसानी गतिविधियों के कारण पिछले 50 वर्ष में यह दूसरा मौका है, जब आर्कटिक में बर्फ कम है। हिंद, प्रशांत और अटलांटिक महासागर में तापमान बढऩे के कारण इस बार आर्कटिक का पर्यावरण सूर्य के संपर्क में अपेक्षाकृत ज्यादा रहा। जैसे ही महासागर गर्म होता है, यह वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है। इसमें मानसून पैटर्न में बदलाव होता है और ज्यादा विनाशकारी चक्रवात उत्पन्न होते हैं। नंदन का कहना है कि हम ऐसे डाटा जुटाएंगे, जो आने वाले युवा वैज्ञानिकों के लिए काफी उपयोगी होगा।