
स्वेज नहर
जयपुर.
लाल सागर से भूमध्य सागर को जोडऩे वाली स्वेज नहर के निर्माण को 150 वर्ष हो गए हैं। 1859 में फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डीनेंड की देखरेख में शुरू हुआ नहर का काम दस वर्ष में पूरा हुआ। 1869 में इसे व्यापार के लिए खोल दिया गया था। 165 किलोमीटर लंबी और 60 मीटर चौड़ी इस नहर से दुनिया का 10 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। स्वेज नहर से यूरोप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका का मार्ग खुल गया, जिसे 9 हजार 550 किलोमीटर की दूरी कम हो गई। इससे पूर्वी अफ्रीका, ईरान, अरब, भारत, पाकिस्तान से लेकर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक देशों के बीच व्यापार सुविधा हो गई।
1887 से पहले नहर से दिन में ही जहाज पार होते थे, लेकिन इसके बाद सुरक्षा प्रबंधों को बढ़ाने के बाद रात में भी नहर से निकासी शुरू हो गई। दिलचस्प बात ये है कि पनामा नहर से इसकी लंबाई दोगुनी होने के बावजूद इस पर पनामा के मुकाबले एक तिहाई ही खर्च हुआ था। 1866 में इस नहर को पार करने में 36 घंटे लगते थे, लेकिन अब 18 घंटे से भी कम समय लगता है। इस वक्त नहर पर मिस्र का नियंत्रण है।
जानिए नहर के स्वामित्व की कहानी
नहर का प्रबंधन पहले स्वेज कैनाल कंपनी करती थी, जिसके आधे शेयर फ्रांस और आधे तुर्की, मिस्र और अरब के थे। मिस्र और तुर्की के शेयर अंग्रेजों ने खरीद लिए। 1888 में समझौता हुआ कि इस पर किसी एक राष्ट्र की सेना नहीं रहेगी। 1904 में अंग्रेजों ने इसे तोड़ दिया और अपनी सेनाएं बैठा दी। 1947 में स्वेज कैनाल कंपनी व मिस्र के बीच तय हुआ कि अधिकार मिस्र का रहेगा। 1951 में ब्रिटेन ने मिस्र में युद्ध छेड़ दिया। लेकिन उसे पीछे हटना पड़ा। 1956 से मिस्र का नियंत्रण है।
Published on:
01 Dec 2019 06:35 pm
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