
डोनाल्ड ट्रंप। (फोटो- ANI)
डोनाल्ड ट्रंप! नाम सुनते ही दुनिया के नेताओं और राजनयिकों के सामने अमेरिका से निपटने की मुश्किल चुनौती सामने आ जाती है। भारत से लेकर चीन, नाटो देशों से लेकर ईरान तक डोनाल्ड ट्रंप ने हर मोर्चे पर अपनी आक्रामक छवि और दबाव वाली रणनीति दिखाई है। व्यापारिक झगड़े हों, रक्षा नीतियों पर विवाद, या अंतरराष्ट्रीय मंच पर बयानबाजी, ट्रंप कभी पीछे नहीं हटते। लेकिन यही डोनाल्ड ट्रंप, जो दुनिया के सामने आंख दिखाने और दबाव बनाने से नहीं कतराते, पर उत्तर कोरिया के सामने अचानक संयम और कूटनीति की भाषा बोलने लगते हैं। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या है, जो ट्रंप जैसे आक्रामक और दबाव वाले नेता को 'उत्तर कोरिया के मामले में कदम फूंक-फूंक कर रखने' पर मजबूर करता है? आइए उन कारणों पर डालते हैं नजर, जिसकी वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति उत्तर कोरिया के खिलाफ रणनीतिक रूप से रहते हैं सतर्क।
उत्तर कोरिया की सीमा से महज 56 किलोमीटर दूर दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल स्थित है, जहां 1 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं और लगभग 28,500 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। उत्तर कोरिया ने सीमा के पास हजारों तोपखाने, रॉकेट लॉन्चर और मोबाइल मिसाइल सिस्टम तैनात किए हैं। किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में सियोल और अमेरिकी ठिकानों को मिनटों में नुकसान पहुंच सकता है। यही कारण है कि अमेरिका यहां हर कदम सोच-समझकर उठाता है और सीधे टकराव से बचता है।
उत्तर कोरिया ने Hwasong-18 जैसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया है, जो अमेरिका के कुछ हिस्सों तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये पूरी तरह परिचालन स्तर पर नहीं हैं, लेकिन उनके परीक्षण और लगातार बढ़ते परमाणु भंडार ने अमेरिका को सतर्क रहने के लिए मजबूर किया है। किसी भी जल्दबाजी वाले सैन्य कदम की कीमत केवल कोरियाई प्रायद्वीप में नहीं, बल्कि अमेरिकी सैनिकों की हानि और वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता में भी चुकानी पड़ सकती है।
चीन या ईरान के खिलाफ अमेरिका आर्थिक और कूटनीतिक दबाव का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उत्तर कोरिया के मामले में सैन्य विकल्प सीमित हैं। किसी भी गलत कदम की संभावना गंभीर क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम ला सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे नजरअंदाज करना असंभव है।
डोनाल्ड ट्रंप ने पहले कार्यकाल में उत्तर कोरिया के खिलाफ सीधे सैन्य टकराव के बजाय 'शिखर वार्ताओं और संवाद' का रास्ता अपनाया। 2018 में सिंगापुर और 2019 में वियतनाम में हुई बैठकें सैन्य तनाव को नियंत्रित करने में मददगार साबित हुईं। अपने दूसरे कार्यकाल (2025–2026) में भी ट्रंप ने रणनीति में संतुलन बनाए रखा है। अमेरिका ने क्षेत्र में नियमित सैन्य अभ्यास और तैनाती जारी रखी, लेकिन वास्तविक टकराव से बचते हुए कूटनीतिक संवाद, शिखर बैठकों और सम्मानजनक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी। इसका उद्देश्य था कि उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल खतरों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। ट्रंप के नरम दिखने वाले तेवर किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि जोखिम को समझकर अपनाई गई व्यावहारिक और रणनीतिक नीति हैं।
उत्तर कोरिया की रणनीतिक स्थिति और उसकी मिसाइल क्षमताओं में हाल के वर्षों में बदलाव आया है। रूस ने उत्तर कोरिया को आधुनिक मिसाइल तकनीक, रॉकेट ईंधन और कुछ रॉकेट-नियंत्रण प्रणाली में सीमित मदद दी है। 2025 में मीडिया और अमेरिकी रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, रूस ने उत्तर कोरिया को कुछ सॉलिड-फ्यूल ICBM परीक्षणों में तकनीकी सलाह दी और रक्षा विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में सहयोग किया।
हालांकि इसे पूर्ण सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता, लेकिन यह सहयोग अमेरिकी रणनीति को और जटिल बनाता है। रूस के तकनीकी समर्थन से उत्तर कोरिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक टिकाऊ बनता है और किसी भी सैन्य टकराव की संभावना को जोखिम भरा कर देता है। इसके अलावा, उत्तर कोरिया के परमाणु भंडार और लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता के कारण अमेरिका को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक दृष्टि से भी सतर्क रहना पड़ता है। यही कारण है कि ट्रंप, जो अन्य देशों के मामले में आक्रामक रहते हैं, उत्तर कोरिया के सामने संयम और कूटनीति का रास्ता चुनते हैं।
उत्तर कोरिया के मामले में ट्रंप का नरम दिखने वाला रुख किसी कमजोरी का संकेत नहीं है। यह सियोल और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा, परमाणु और लंबी दूरी की मिसाइल खतरा, सीमित सैन्य विकल्प, कूटनीतिक मजबूरी और बदलते वैश्विक समीकरण में रूस के तकनीकी सहयोग का परिणाम है। यही वजह है कि जहां ट्रंप दुनिया के कई देशों के खिलाफ आक्रामक रहते हैं, वहीं उत्तर कोरिया के सामने उनका कदम संयमित और रणनीतिक नजर आता है।
Published on:
03 Feb 2026 09:47 am

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