उसी समय गुस्से में आकर उन्होंने मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। मुंबई में एक दोस्त था उसने शुरूआत में काफी मदद की पर बिना हुनर के तो कुछ किया नहीं जा सकता इसलिए जल्द ही उन्हें मधुवाला, दो दिल एक जान, सपनों के भवन में, भाग्य विधाता समेत अन्य नाटकों में उन्हें बतौर सहायक निर्देशक का काम मिल गया। फिर क्या था मेहनत व लगन की दम पर उन्होंने काम को आगे बढ़ाया और डायरेक्टर बन गए।