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मंदबुद्धि की न करें शादी, जानिए क्यों

माता-पिता सोचते हैं कि मंदबुद्धि की शादी कर दो, सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है। शादी के बाद दो परिवारों पर बुरी बीतती है। फिर कोर्ट का चक्कर शुरू हो जाता है।

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Bhanu Pratap Singh

Apr 03, 2016

आगरा. मदंबुद्धि यानि दिव्यांग। समाज के ऐसे बच्चे, जो दिखते तो हमारी तरह है, लेकिन सोचने और समझने की शक्ति बेहद कम होती है। इस शक्ति को बढ़ाने के लिए अभिवावक कदम उठाते हैं। वे सोचते हैं कि शादी के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा। मंदबुद्धि संस्थान टीयर्स की निदेशिका डा. रीता अग्रवाल बताती हैं कि परिजनों द्वारा दिव्यांगों की शादी के रूप में दिया गया आशीर्वाद उनके लिए अभिशाप है। कई मामले आगरा के ऐसे हैं, जिनमें इस भूल के कारण दो परिवार बर्बादी आग में झुलस रहे हैं।

शादी नहीं मानसिक रोग से निपटने का उपाय
टीयर्स की निदेशिका डॉ. रीता अग्रवाल ने बताया कि माइल्ड का आजीवन दिमाग 11 वर्ष और मोटरेट का दिमाग आजीवन 8 वर्ष के बच्चे की तरह वर्क करता है। इन बच्चों की टीयर्स में ट्रेनिंग हुई, वे अपना काम स्वयं करने लगे। काफी जिम्मेदारियां उठाना सीख गये, लेकिन इसका परिवारीजनों ने गलत मतलब निकाला। उन्होंने सोचा कि अब यदि शादी कर दी जाये, तो ये बच्चे बिलकुल ठीक हो जायेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिवार के लोग गलत साबित हुए। शादी के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया।

टूट गये रिश्ते
इन चार मामलों में तीन युवक और एक युवती थी, जिन्हें शादी के उस बंधन में बांध दिया गया, जिसका शायद वे मतलब भी नहीं समझते थे। टीयर्स की निदेशिका ने इन मामलों में किसी का नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक एसबीआई बैंक के मैनेजर ने अपने पुत्र का विवाह गरीब घर की बेटी से किया। पैसे के बल पर शादी तो हुई, लेकिन जब शादी के बाद लड़की की इच्छायें पूरी न हो सकीं, तो वह अपने मां-बाप के घर चली गई। धोखाधड़ी के आरोप में मुकदमा दर्ज करा दिया गया।

कोर्ट के चक्कर लगा रहे
ऐसे ही आगरा के एक बड़े व्यापारी परिवार के बच्चे के साथ हुआ। पैसे के बल पर उसकी भी शादी कराई गई। चार उदाहरण हैं शादी के जिनमें आज के समय में परिवार कोर्ट कचहरी के चक्कर में परेशान हैं।

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