
devaki nandan thakur
एक राजा को अपने सेवक से बहुत स्नेह था। वह सेवक था ही स्वामीभक्त, अनन्य और बहुत पुराना।
एक बार राजा ने बाग में एक फल तोड़कर काटा और बड़े चाव से एक कली सेवक को दी। सेवक ने कली खाकर कहा- “स्वामी! एक कली और।”
राजा ने कौतूहल के साथ एक कली और दे दी कि शायद सेवक को फल बहुत स्वादिष्ट लगा है। सेवक मांगता रहा और राजा सेवक को कलियाँ देता रहा। जब आखिरी कली बची तो राजा बोला- “क्यों रे! सब तू ही खा जाएगा क्या? अब नहीं दूंगा यह कली मैं खाऊंगा।”
यह सुनकर सेवक ने झपट्टा मारकर कली लेनी चाही पर तब तक राजा उस कली को मुंह में रख चुका था। वह फल इतना कड़वा था कि राजा का चेहरा बिगड़ गया और उसने तुरंत कली को थूकना चाहा जिसे सेवक कितनी देर से मुस्कुराता हुआ खा रहा था।
राजा हैरान होकर बोला- “बाप रे! इतना कड़वा फल, और तू मुस्कुराता हुआ खाता रहा। तूने बताया क्यों नहीं!”
सेवक वाला- “मैं नहीं चाहता था कि मेरे मालिक को ऐसा कड़वा फल खाना पड़े इसलिए मांग -मांगकर खाता गया। रही आपको बताने की बात, तो हे मालिक! जिन हाथों से हमेशा इतना कुछ मिला, सुख मिला, मीठे फल मिले उनसे कड़वा फल भी मिले तो शिकायत क्या करना।”
सीख
हमेशा गुरु या मालिक के प्रति वफादार और ईमानदारी से पेश आना चाहिए।
प्रस्तुतिः हरिहरपुरी
मठ प्रशासक, श्रीमनःकामेश्वर नाथ मंदिर, आगरा
Published on:
16 Feb 2019 07:50 am

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