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हमें सबसे अच्छी सीख देती है तीन मित्रों की ये कहानी

प्रत्येक अवसर हमारे लिए एक वरदान है। इसलिए हर अवसर के साथ एक अपूर्व कलाकृति की भांति व्यवहार करना चाहिए।

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वर्तमान

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बसंतपुर नगर में तीन मित्र रहते थे। यद्यपि उनके मत भिन्न-भिन्न थे, परन्तु उनके मन मिलते थे। एक बार बातों-बातों में बिना किसी पूर्व तैयारी के वे तीर्थयात्रा पर चल पड़े। न उनके पास रास्ते के लिए कुछ पाथेय था न ही उन्हें मार्ग की जानकारी थी।

सुबह से शाम तक निरंतर पैदल चलने के कारण वे थक गए थे। अतः विश्राम करने हेतु एक पेड़ के नीचे रुके। उन्हें कड़ाके की भूख लग रही थी और भोजन सामग्री उनके पास थी ही नहीं। जैसे-तैसे तीनों ने मिलकर चार रोटी का जुगाड़ किया। एक-एक रोटी खाने के बाद समस्या खड़ी हो गई क्योंकि एक रोटी को कौन खाएगा, इसके लिए विवाद शुरू हो गया।

एक मित्र ने सुझाव देते हुए कहा- विवाद करना व्यर्थ है। अब हम सब थके हुए हैं। अतः कुछ देर विश्राम कर लेते हैं। नींद में जो सबसे अच्छा सपना देखेगा, वही यह रोटी खाएगा। सबको बात जँच गई और वे सब विश्राम करने के लिए तैयार हो गए।

नींद में तीनों ने सपने देखे और जागने के बाद अपना-अपना सपना सुनाने लगे। एक ने कहा- मैंने सपने में देखा कि मैं पूर्व जन्म में एक बहुत बड़ा चक्रवर्ती राजा था। मेरे ठाट-बाट, आमोद-प्रमोद और साजबाज निराला था। हजारों रानियों से घिरा हुआ मैं ऋद्धि-समृद्धि का भोग करने में तल्लीन था कि अचानक मेरी आँख खुल गई।

दूसरे ने कहा- मेरा सपना मेरे भविष्य से संबंधित था। मैंने देखा कि अगले जन्म में मैं इन्द्र बनूंगा। वहां अनेक अप्सराएं मेरी सेवा में तैनात होंगी। वहां स्वर्णजड़ित सिंहासन पर बैठकर मैं देवों को आदेश दूंगा। मुझे बिना मांगे सबकुछ मिलेगा और मेरी हर चाहत पूर्ण होगी। मेरा सपना बहुत सुंदर है इसलिए इस रोटी पर मेरा अधिकार है।

तीसरे ने कहा- मुझे सपने में हनुमानजी के दर्शन हुए और उनका विकराल रूप देखकर मैं बहुत डर गया क्योंकि बहुत गुस्से में थे। उनका आँखें लाल थीं। भौंहें तनी हुई थीं और नसें फूल रही थीं। एड़ी से चोटी तक वे गुस्से में प्रकंपित हो रहे थे। मैंने उनको नमस्कार करने के लिए जैसे ही मस्तक झुकाया, उन्होंने मेरी कमर पर लात मारते हुए कहा कि मूर्ख यह समय नींद में सोने के लिए नहीं है। जल्दी से उठ और यह रोटी खा लो, वरना दो-चार लातें और मारूंगा।

यह सुनकर दोनों मित्र साश्चर्य उसकी मुख-मुद्रा निहारने लगे। उसने अपना सपना आगे बताते हुए कहा- हनुमान जी का ऐसा डरावना रूप देखकर मैं भय से कांप उठा। मरता क्या न करता, ह सोचकर मैं चुपचाप उठा और रोटी खाकर पुनः सो गया। दोनों मित्र अवाक होकर अपलक दृष्टि से उसको देखते ही रह गए।

सीख

एक मित्र ने अतीत का सपना देखा और दूसरे ने भविष्य का, किन्तु तीसरा मित्र इतना कुशल था कि उसने वर्तमान को प्रधानता देकर प्राप्त अवसर को साथ लिया। प्रत्येक अवसर हमारे लिए एक वरदान है। इसलिए हर अवसर के साथ एक अपूर्व कलाकृति की भांति व्यवहार करना चाहिए।

शानदार था भूत तो भविष्य भी महान है।

किन्तु संभालो इसे जो वर्तमान है।।

प्रस्तुतिः सतीश चन्द्र अग्रवाल

आनंद वृंदावन, संजय प्लेस, आगरा

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