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भैरव अष्टमी आज, जानिए शिव के दूसरे स्वरूप काल भैरव को मनाने की विधि, पापों का होता है समूल नाश

मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव की जयंती के रूप में मनाया जाता है, इसे कालाष्टमी अथवा भैरवाष्टमी भी कहा जाता है  

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आगरा

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Abhishek Saxena

Nov 29, 2018

kal bhairav

भैरव अष्टमी आज, जानिए शिव के दूसरे स्वरूप काल भैरव को मनाने की विधि, पापों का होता है समूल नाश

आगरा। काल भैरव जयंती आज है। अष्टमी तिथि शाम 6 बजकर 50 मिनट से आरम्भ हो जाएगी, जो कि 30 नवम्बर को शाम 4 बजकर 57 मिनट तक रहेगी। काल भैरव अष्टमी का पर्व रात्रि में मनाया जाता है। इसलिए सूर्यास्त के बाद अष्टमी तिथि का होना आवश्यक होता है, जो कि इस बार 29 नवम्बर को रात्रि में अष्टमी तिथि का संयोग है।

शिव का रूप हैं काल भैरव
वैदिक सूत्रम के चेयरमैन और भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि काल भैरव शिव का ही रुप हैं। उनकी उत्पत्ति का दिन बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है और उसे ही काल भैरव जयंती कहा जाता है। काल भैरव अष्टमी या जयंती मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ती है। शिव के रक्त के दो भाग हुए, प्रथम से बटुक भैरव और दूसरे से काल भैरव उत्पन्न हुए। काल भैरव में शिव का प्रचंड रुप दर्शाया गया है। काल भैरव का अर्थ होता है भय को हराने वाला यानि भय को खत्म करने वाला। जो भी पाप करता है उसे इस दिन दंड मिलता है। चाहे वो देवता हों या इंसान, पापियों को बख्शा नहीं जाता। वहीं जिनका मन सच्चा होता है उनके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। नकारात्मक शक्तियां काल भैरव के सच्चे भक्तों से दूर रहती हैं और न ही काम में कोई अड़चन आती है। हर तरह के दु:ख दूर हो जाते हैं बाबा काल भैरव के भक्तों के जो सच्चे मन से इनकी उपासना करता है।

ऐसे करें काल भैरव की पूजा
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने काल भैरव जयंती के व्रत एवं पूजा विधि के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि भगवान काल भैरव तंत्र विद्या के देवता भी माने जाते हैं। यही कारण है कि तांत्रिक काल भैरव की उपासना करते हैं। वैदिक प्राचीन हिन्दू शास्त्रों के मान्यता के अनुसार इनकी उपासना रात्रि में की जाती है। रात भर जागरण कर भगवान शिव, माता पार्वती एवं भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है। काल भैरव के वाहन काले कुत्ते की भी पूजा होती है। कुत्ते को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पूजा के समय काल भैरव की कथा भी सुनी या पढ़ी जाती है। अगले दिन प्रात:काल पवित्र नदी या किसी तीर्थ स्थल में नहाकर श्राद्ध व तर्पण भी किया जाता है। इसके बाद भैरव को राख अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भैरव की पूजा करने वाला निर्भय हो जाता है। उसे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं होती। उसके समस्त कष्ट बाबा काल भैरव हर लेते हैं।