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पकौड़ा पॉलिटिक्सः डबल फाटक के गर्मागर्म मंगौड़े..बाबा चटनी कम देता था

बाबा के मंगौड़े खाने के लिए लोग प्रतीक्षा करते थे। यह कामना करते थे कि डबल फाटक बंद मिले, ताकि मंगौड़े खा सकें।

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pakoda

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आगरा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह से पकौड़ा क्या निकला है, हर कोई इसी पर चर्चा कर रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में पकौड़ा का समर्थन किया तो बात और बढ़ गई है। समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेसी पकौड़ा तलकर विरोध दर्ज करा रहे हैं। सोशल मीडिया भी तरह-तरह के तंज कसे जा रहे हैं। इन सबके बीच डबल फाटक के मंगौड़े याद आ रहे हैं। जब मंगौड़ों की बात आती है तो मुंह में आज भी पानी आ जाता है। बाबा के मंगौड़े खाने के लिए लोग प्रतीक्षा करते थे। यह कामना करते थे कि डबल फाटक बंद मिले, ताकि मंगौड़े खा सकें।

लग्जरी गाड़ियों वाले करते थे इंतजार

आगरा के वरिष्ठ पत्रकार गिरधारी लाल गोयल ने बाबा के मंगौड़ों पर अपनी फेसबुक दीवार पर उल्लेख किया है। वे लिखते हैं- आगरा में पुरानी मथुरा रोड पर हलवाइयों की बगीची से आगे डबल फाटक से ठीक पहले मूंग की दाल के मंगौड़े (पकौड़े) का ठेला लगा करता था। उसके स्वाद से आकर्षित भीड़, जिसमें आज से बीस साल पहले तमाम लग्जरी गाड़ी वाले भी शामिल थे, ने ठेले का तख्त बनवा दिया। छप्पर भी पड़ गया। फिर धीरे धीरे वहां तीन गुमटी बन गईं। कम्पटीशन में ग्राहकों को एक फायदा हुआ कि लग्जरी गाड़ी वाले ग्राहकों के बावजूद मंगौड़ों की रेट ज्यादा नहीं बढ़ पाई। हाँ इतना जरूर हुआ कि हाथ से पिसने वाली दाल ग्राइंडर पर ही पिसने लगी थी। सो पुराने खाने वालों के लिए मंगौड़ों ने अपना मूल स्वाद बदल दिया था। फिर वहां फ्लाई ओवर बनना शुरू हुआ। गुमटियां ना जाने कहाँ चलीं गईं। वहां दसियों साल से खड़े हो कर वेट करने वाली गाड़ियां भी गायब हो गईं।

सूखे धनिये की लाल मिर्च वाली चटनी

हालांकि मैं बाजार में कुछ भी खाने से परहेज करता हूँ, लेकिन दसियों साल से एक बुरी आदत उधर से गुजरते हुए उन मंगौड़ों के खाने की पड़ चुकी थी। सो वहां से जब भी भी निकला, नजरें हमेशा इधर-उधर उन मंगौड़ों की ठेल या तख्त को तलाशती थीं। एक दिन एक ठेल गुरुद्वारे के सामने की साइड में दिखी। रुका तो उन्हीं गुमटी वालों में ही एक था और सुखद या दुखद आश्चर्य ये था कि जिसकी फाटक वाली गुमटी पर अपनी बारी के इंतजार में मुंह में पानी आ आ कर सूख जाता था, उसी की ठेल पर मेरे रुकने पर स्टोव को तीली दिखाई गयी थी। खैर मंगौड़े खाए। खट्टी और सूखे धनिये की लाल मिर्च वाली चटनी बार-बार डलवा कर खाने से कनपटियों पर पसीना तो बह निकला, पर वो पुराना स्वाद नहीं आ पा रहा था। मंगौड़ों में सरसों के तेल का स्वाद कुछ अलग सा था। सो उसे बढ़िया तेल के ब्रांड और शुद्ध तेल मिलने के ठिकाने बताए।

अब नहीं देते दिखाई

अभी कुछ दिन पहले वहां से फिर गुजरना हुआ। भतीजा साथ था। उसको भी उन मंगौड़ों की याद आ गई। फिर उस मंगौड़े वाले की तलाश शुरू हुई। फ्लाई ओवर के इधर-उधर 500 मीटर तक दो चक्कर लगाए लेकिन कोई भी ठेला वहां दिखाई नहीं दिया। पता नहीं उन ठेले वालों ने कोई स्टारर रेस्टोरेंट खोल लिया या मैकडोनाल्ड की फ्रेंचाइजी ले ली।

चटनी मांगने पर झल्ला जाता था

इस फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणियों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह लगातार जारी है। वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश गौड़ ने लिखा है- बिल्कुल सही। क्या याद दिला दी। मैंने कई बार उन लजीज मंगौड़ों का लुत्फ उठाया है। वाह क्या स्वाद था, परंतु बाबा चटनी कम देता था। बार-बार मांगने पर झल्ला जाता था। एएस काला लिखते हैं कि आगरा,-मथुरा आते-जाते हमेशा रेल फाटक बन्द मिलने की कामना रहती थी, जिससे बाबा के मंगौड़े लेने का मौका मिल जाए। फ्लाईओवर बनने के बाद सिर्फ दरेसी वाले के ही भरोसे रह गए हैं। राजेश गुप्ता ने लिखा- मैं भी कल आगरा में था। काफी ढूंढा पर नहीं मिला और उससे ज्यादा समस्या जाम की रही गुरुद्वारा के सामने। पत्रकार शंकरदेव तिवारी ने ठिकाने बताए- उनमें से एक का पंती है जो सीएमओ ऑफिस के बीच की सड़क के मुहाने पर लगा रहा है। वही स्वाद वही आदत कम बनाने की और नक्शेबाजी वही। उसी के तरह की झेलते हुए इन्जार कराने की वही आदत कम सिके नहीं देता। सूखी चटनी पत्ती पर रखना नहीं भूलता ।

अब वह स्वाद कहां

आशुतोष दुबे ने लिखा है कि गुरु के ताल पर लगाता है ठेले। अभी भी लोग सिकने का इंतजार करते हैं। संदीप बसलस लिखते हैं कि अब वो फ्लाई ओवर से पहले कॉल सेंटर वाली बिल्डिंग के सामने है। टेस्ट खत्म हो चुका पुराना वाला। संजय अग्रवाल बताते हैं कि आज भी वो तख्त लगते हैं आवास विकास की तरफ, जहाँ फ्लाई ओवर खत्म होता है। बबले सीमा भारद्वाज को भी मंगौड़ों की याद करते हुए लिखा- वह स्वाद कहां से आएगा। उनके बेटे ने व्यवसाय अलग-अलग कर लिया। दो अलग-अलग जगह उसी नाम से दुकान चला रहे हैं। अनिल दीक्षित ने जानकारी दी कि कि तीन भाइयों की अलग अलग दुकान हैं, फ्लाईओवर के तीन तरफ। आनंद शर्मा ने चुटकी ली- मंगोड़े वाले की मॉल में ही कहीं दुकान है। कुछ दिन पहले ही पता चला है।

नया ठिकाना बताया

रजनीश शर्मा ने पकौड़ों के नए ठिकाने का पता बताया है- आगरा में बोदला चौराहे से जो रास्ता बिचपुरी जाता है, वहीं पर बिचपुरी रेलवे फाटक के ठीक कोने पर एक मंगौड़े की दुकान है। जब भी देखो तो ऐसा लगता है मुफ्त भंडारा चल रहा है। सामान्य से महंगा रहता है, फिर भी भीड़ है। पकौड़े बेचना और खाना शर्म की बात है बुद्धिजीवियों के लिए, घनघोर पाप है। आशीष प्रधान ने बताया मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की जोरा तहसील में एक मंगौड़े वाला है, बाबू लाल मंगौड़े वाला। कभी जाना हो तो खा कर आइयेगा । शायद वह पुराना स्वाद मिल जाए।

इंटरनेशनल पकौड़ा डे भी मनाया जाएगा

निशांत शंकर पाटील ने लिखा है- मोदी के पकौड़ा रोजगार को लेकर जितनी भी बात हो रही है, उसमें कोई बता सकता है कि क्या मोदीजी ने कभी कहा कि अपनी बैंक की जॉब छोड़ कर पकौड़े बेचो, इंजीनियर की नौकरी छोड़ कर पकौड़े बेचो या टीचर की नौकरी छोड़ कर पकोड़े बेचो, अपने चलते हुए कारोबार को छोड़कर पकौड़े बेचो। पकौड़े बेचने की सलाह उन्हें दी है, जिनकी भीख मांगने की नौबत है या जेब काटने की। ऑप्शन दो हैं, जो सबके लिए खुले हैं- मेहनत करके स्थाई सम्पदा बनाने का या पकौड़े न बेच कर जेब काट कर कुछ साल ऐश कर फिर सड़क पर आने का। भूपेन्द्र नागर ने लिखते हैं कि योग के बाद अब विश्व में पकौड़े भी भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाएंगे। किसी दिन इंटरनेशनल पकौड़ा डे भी सम्पूर्ण विश्व में धूमधाम से मनाया जाएगा। कमलेश नाहर ने दर्द बयां किया है- पकोड़े बनाएं कहाँ। स्मार्ट सिटी के चक्कर में नगर निगम वाले ठेले वालों को भगा देते हैं। एक अदद दुकान लेने के लिए रुपये चाहिए। मुद्रा लोन वाले दुकान के लिए लोन देंगे नहीं। अपना तो इतना ही बजट है कि पकौड़े तलने का सामान तो ला सकते है पर दुकान?