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संघ की “शाखा” और 92 वर्ष की अविरत साधना, जानिए क्या था संघ स्थापना का मूल उद्देश्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस विजयादशमी को 92 वर्ष का हो गए हैं।

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आगरा

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Dhirendra yadav

Oct 01, 2017

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आगरा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस विजयादशमी को 92 वर्ष का हो गए हैं। संघ के इस 92 वर्ष के संगठनात्मक उपलब्धि और विस्तार की चर्चा करना इस समय बेहद प्रासंगिक है। प्रासंगिक इसलिए भी है, क्योंकि यह भारत ही नहीं वरन संसार का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। इसलिए यह सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करने वाला संगठन भी है।


नागपुर में हुई थी स्थापना
विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में विख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितम्बर, 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में हुई थी। केवल 5 छोटे बच्चों की शाखा से प्रारंभ हुए इस संगठन की वर्तमान शक्ति, सामर्थ्य और विस्तार सज्जनों को संतोष प्रदान करने वाला है, लेकिन पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटें बोते रहे, पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए। आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है, जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया।


संघ के शक्तिशाली होने का रहस्य
वास्तव में डॉ. हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य। डॉ. हेडगेवार के आहवान पर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया, जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बाला साहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभाव प्रमुख थे। इन सभी के अनथक प्रयत्नों से संघ संख्यात्मक, गुणात्मक और संगठनात्मक दृष्टि से बढ़ता ही गया। संघ के संगठन संरचना में अधिकारी के निर्देशों का स्वयंसेवकों द्वारा अक्षरशः पालन करने की अदभुत अनुशासित परम्परा है। संघ के प्रचारक राष्ट्र पुनरुत्थान के संकल्प को जीते हैं और अपने आचरण व व्यवहार से अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को राष्ट्रोत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।

अन्य देशों में भी संघ
राष्ट्र को समर्पित प्रचारकों व स्वयंसेवकों के व्यवहार और चरित्र के बल पर संघ आज देश के प्रत्येक क्षेत्र में हरेक तबकों में कार्यरत है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अन्य देशों में भी संघ का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के रूप में संघ का कार्य चलता है। उपरोक्त विचार आगरा विभाग प्रचारक धर्मेन्द्र द्वारा स्वयंसेवकों के मध्य आज के विजयदशमी के उपलक्ष्य में साकेत नगर की अर्जुन शाखा के कार्यक्रम में रखे गए।