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RSS ने बनाया नया रिकॉर्ड, 249 स्थानों पर एक साथ गुरु दक्षिणा कार्यक्रम

-गुरु दक्षिणा में प्राप्त धन से ही RSS का खर्चा चलता है-संघ का गुरु भगवा ध्वज, स्वयंसेवकों ने किया धन अर्पण-संघ अपने खर्चा चलाने के लिए किसी से चंदा नहीं करता-1925 में नागपुर में हुई थी आरएसएस की स्थापना
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आगरा

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Dhirendra yadav

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Updated: 28 Jul 2019, 12:26 PM IST

Bhagwa dhwaj

Bhagwa dhwaj

आगरा। आरएसएस(RSS) के नाम से प्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriy svayamsevak sangh) ने ताजमहल (Tajmahal) के शहर में नया रिकॉर्ड बनाया है। महानगर में एक साथ एक समय पर 249 स्थानों पर गुरु दक्षिणा (Guru dakshina) कार्यक्रम किया। हजारों स्वयंसेवकों ने अपने गुरु भगवा ध्वज का पूजन किया। धन का अर्पण किया। गुरु दक्षिणा में प्राप्त धन से ही संघ का खर्चा चलता है। संघ अपने खर्चा चलाने के लिए किसी से चंदा नहीं करता है।

साल में छह उत्सव समाज को जोड़ने के लिए
शास्त्रीनगर की केशव शाखा का गुरुदक्षिणा कार्यक्रम राधे गार्डन, शास्त्रीपुरम (सिकंदरा, आगरा) में हुआ। मुख्य वक्ता, पूर्व प्राचार्य और संघ की प्रांतीय बौद्धिक टोली के सदस्य देवेन्द्र दुबे ने कहा कि विजयदशमी के दिन 1925 में नागपुर में संघ की स्थापना डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ साल में छह उत्सव मनाता है। ये हैं- चैत्र प्रतिपदा पर नववर्ष, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव, आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूजा, श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन, विजयदशमी और मकर संक्रांति। संघ के सभी उत्सव समाज को जोड़ने के लिए होते हैं। चैत्र प्रतिपदा को संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को जन्मदिन भी है।

हिन्दुओं में वीरता का भाव
श्री दुबे ने कहा कि मुगलों का कार्यकाल बहुत ही क्रूर था। इतनी हत्याएं की कि जनेऊ तौले जाते थे। हर व्यक्ति भयभीत था, लेकिन हिन्दू समाज ने कभी हार नहीं मानी। वीरों की भी कमी नहीं थी। शिवाजी महाराज ने संघर्ष किया और हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की। इसी कारण हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव के माध्यम से हिन्दुओं में वीरता का भाव पैदा होता है।

संघ ने भगवा ध्वज को गुरु माना
उन्होंने कहा कि गुरु पूजा हमारे समाज में सर्वत्र होती है। बिना गुरु की कृपा के कल्याण संभव नहीं है। गुरु के प्रति श्रद्धा का समर्पण करते हैं। संघ ने भगवा ध्वज को गुरु माना है, क्योंकि यह जीवन, बलिदान, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है। व्यक्ति को गुरु बनाते हैं तो उसमें विकार आ जाता है। हम देखते हैं कि जिस गुरु की पूजा करते हैं, उसमें भी दोष आ जाता है। दूसरे वह नश्वर है। भगवा ध्वज नश्वर नहीं है। हमारी संस्कृति का मूल आधार ही त्याग है। हमारे समाज में त्यागी को सम्मान मिलता है, पैसे वाले को नहीं। उन्होंने तमाम उदाहरण देते हुए त्याग की महिमा बताई। स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक व्यक्ति द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा था-अमेरिका में कोई सम्पन्न व्यक्ति घर छोड़कर भगवान को पाने के लिए जंगल जाने की बात करता है तो उसे मेंटल कहा जाता है, लेकिन हमारे यहां वह संन्यासी कहलाता है और सर्वत्र पूजनीय हो जाता है। हमारे यहां लोक कल्याण महत्वपूर्ण है।

उत्तर पूर्व राज्यों में प्रचारकों की हत्या

उन्होंने कहा कि उत्तर पूर्व राज्य जैसे मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर में ईसाइयों का बोलबाला है। वहां हमारे प्रचारकों की हत्या कर दी जाती है। प्रचारकों को भोजन कराने वाले भी नहीं है। इन राज्यों में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को धन की बहुत आवश्यकता है। इस बात का भी हमें ध्यान रखना चाहिए। अध्यक्षता उद्योग विभाग में सहायक निदेशक आरके शुक्ला ने की। उन्होंने स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि वे समाज को आगे ले जाने के लिए अग्रसर हों। ईश्वर की तरह गुरु की पूजा करें। हिन्दुओं का संगठन बहुत बड़ी बात है।

ये रहे उपस्थित

इस मौके पर मुख्य शिक्षक की भूमिका सुरेन्द्र सिंह ने निभाई। प्रार्थना राजकिशोर सिंह परमार ने कराई। संचालन शाखा कार्यवाह नवीन अग्रवाल ने किया। विश्वजीत ने गीत प्रस्तुत किया। सेवा भारती आगरा विभाग के अध्यक्ष वीरेन्द्र वाष्र्णेय, हरभान चाहर, लोकेन्द्र चाहर, डीसी शर्मा, श्रवण कुमार सिंह, अरुण पचौरी एडवोकेट, राम नारायण राजपूत, मुकेश गोयल आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

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