
sharad purnima
आगरा। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। ऐसा लगता है कि चन्द्रमा को निहारते ही रहें। चारु चन्द्र की चंचल किरणें जब धवल ताजमहल पर पड़ती हैं तो यह चमक उठता है। फिर शोर मच जाता है ये चमकी, वो चमकी। समय के साथ यह शोर थम गया है। रात्रि में ताजमहल के को दूर से ही देखा जा सकता है। प्रतिबंध इतने हैं कि आगरा वालों का तो उधर जाने का ही मन नहीं करता है।
वो भी क्या दिन थे
ताजमहल के निकट कटरा जोगीदास में निवासरत अश्वनी वशिष्ठ बताते हैं- शरद पूर्णिमा पर ताजमहल पूरी रात खुलता था। ताजमहल के पश्चिमी गेट से प्रवेश मिलता था। पुरानी मंडी से लेकर ताजमहल तक पूरा मेला लगता था। ताजमहल के मुख्य गुम्बद तक जाने और उतरने के लिए लकड़ी की पाड़ बनाई जाती थी। भीड़ अधिक होने पर गौशाला गेट से भी निकाला जाता था। कोई सुरक्षा जांच नहीं होती थी। लोग देर रात्रि तक ताजमहल के मुख्य गुम्बद के चमकने का इन्तजार करते थे। जैसे ही चन्द्रमा की किरण विशेष कोण पर पड़ती, ताजमहल चमक उठता था।
ताजंगज निवासी पंडित ब्रह्मदत्त शर्मा ने बताया कि हम ताजमहल में चमकी मित्रों के साथ देखने जाया करते थे। तब सर्दी बहुत होती थी। कानों को ढककर जाते थे। ताजमहल की चमकी देखने के लिए बहुत लालायित रहते थे। अब तो सबकुछ बदल चुका है। 1984 में किसी सिरफिरे ने ताजमहल को बम से उड़ाने की धमकी दी और लोगों का प्रवेश रोक दिया गया। इसके साथ ही ताजमहल में चमकी देखना भी बंद हो गया। वो भी क्या दिन थे, जब हमारे रिश्तेदार चमकी देखने के लिए एक दिन पहले ही आ जाते थे। पहले टिकट भी नहीं लगता था। अब टिकट लगता है। उन दिनों में कुछ लोग लड़कियों की ओर अंगुली करके भी कहते थे वो चमकी। उन्हें बुजुर्ग डांटते थे। पुलिस वाले सिर्फ गेट पर खड़े रहते थे। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को बहुत मेहनत करनी पड़ती।
Published on:
05 Oct 2017 04:10 pm
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