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Travel: एक पुल ऐसा जिसके नीचे नदी तो ऊपर बहती है नहर

ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार को तो हर कोई जानता है लेकिन हमारे देश में कुछ ऐसी भी जगह हैं, जिन्हें देख कर आप चौंक जाएंगे। ऐसा ही एक ब्रिज है, जिसे दूर-दूर से लोग देखने आते हैं।  

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Bhanu Pratap Singh

Mar 31, 2016

bridge travel

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कासगंज। भारत देश हमेशा ही ऐतिहासिक स्मारकों का देश रहा है। चाहे ताजमहल हो या फिर लाल किला या फिर कुतुबमीनार। सभी स्मारक अपने आप में एक उत्कृष्ट निर्माण कला के नायाब नमूने हैं। ऐसा ही एक स्मारक उत्तर प्रदेश के जनपद कासगंज के ग्राम नदरई स्थित झाल का पुल है, जो ब्रिटिश शासनकाल की उत्कृष्ट निर्माण कला का ऐतिहासिक उदाहरण है।

ऊपर हजारा नहर, तो नीचे काली नदी
पुल के ऊपर बहती हजारा नहर और नीचे काली नदी की अविरल छटा देखते ही बनती है। इतना ही नहीं दोनों नदियों के बीच बने पुल के बीचों-बीच बनी कोठरियां स्वयं में अनूठी हैं। काली नदी से सौ फुट की ऊंचाई पर पुल का निर्माण इस तरह से किया गया कि ऊपर से हजारा नहर की निकासी हुई। नदी एवं नहर के बीचों-बीच 15 सुरंग मार्ग कोठरियों का निर्माण किया गया। जिन्हें चोर कोठरियों के नाम से जाना जाता है। जगह-जगह सीढ़ियां बनाकर इन कोठरियों में उतरने के भी इन्तजामात किए गए हैं। इस पुल को सिंचाई विभाग की ऐतिहासिक और उत्कर्ष संरचना माना जाता है। चूंकि इतना पुराना पुल होने के बावजूद इसकी मजबूती आज भी बरकरार है।

१३० वर्ष पुराना है पुल
बताया जाता है कि बिट्रिश काल का यह पुल लगभग 130 वर्ष पुराना है। इस पुल का निर्माण सन् 1885 में शुरू हुआ था। चार वर्ष में इसका निर्माण तत्कालीन मुख्य अभियंता सिंचाई विभाग एनडब्लू पी एवं कर्नल डब्लू एएच ग्रेट हैंड के निर्देशन में पूरा हुआ। इतिहास के जानकारों के मुताबिक ग्राम छावनी में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान स्थानीय मुख्यालय हुआ करता था। जहां जिला मजिस्ट्रेट की हैसियत एवं उसके नुमाइन्दे मय फौज के निवास करते थे। इस इलाके में जलापूर्ति का एक मात्र साधन काली नदी थी, जिससे क्षेत्र के किसानों एवं अन्य लोगों को जलापूर्ति का अभाव रहता था। जलाभाव से पीड़ित लोगों की मांग पर ही अंग्रेजी हुकूमत ने यहां हजारा नहर बनवाई।


वार्षिक मेले में उमड़ती है हजारों की भीड़
यहां होली के बाद वार्षिक मेले का भी आय़ोजन होता है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मेले में भारी संख्या में लोग आए। लोगों के लिए झाड़ का पुल मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है।

84 मन का घंटा लोगों के लिए चर्चा का विषय
झाल के पुल से एक किलोमीटर की दूरी पर शिव एवं पार्वती के मंदिर में रखा चैरासी मन का घंटा भी अपनी एक ऐतिहासिक कहानी बयां करता है। जानकारों के मुताबिक सन् 1855 में अंग्रेजों ने वर्मा पर दूसरी बार आक्रमण कर जीत हासिल की थी, जिसका पूरा श्रेय अंग्रेजी सेना में भर्ती तोपखाने के रिसाललदार गांव नदरई निवासी ब्राह्मण भीमसेन को दिया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भीमसैन की बफादारी एवं बहादुरी से खुश होकर उन्हें ये घंटा बतौर तोहफा दिया था। जिसे भीमसेन ने गांव के सबसे ऊंचे टीले पर ले जाकर स्थापित किया तथा धार्मिक प्रवृति के चलते भीमसेन ने समीप में ही एक शिवजी एवं पार्वती का गणेश भगवान सहित मंदिर भी स्थापित भी किया।

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