
Gujarat: राज्यपाल देवव्रत ने कहा, प्राकृतिक खेती हर तरह से बेहतर, किसान होंगे समृद्ध,
गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत राज्य में प्राकृतिक खेती का अभियान छेड़े हैं। उन्होंने अभियान को मिली सफलता को देख इसे पूरे देश में विस्तार दिया है। सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुजरात के 9 लाख किसान प्राकृृतिक खेती अपना चुके हैं। डांग जिला राज्य का पहला प्राकृतिक कृषि आधारित जिला घोषित हो चुका है। इसमें राज्यपाल के प्रयासों का अहम योगदान है। प्राकृतिक खेती पर विश्व का पहला विश्वविद्यालय भी राज्य के पंचमहाल जिले के हालोल में स्थापित किया गया है। पत्रिका अहमदाबाद के संपादकीय प्रभारी उदय पटेल व डिप्टी न्यूज एडिटर पुष्पेन्द्र सिंह ने उनसे प्राकृतिक खेती के मिशन पर बातचीत की। पेश हैं बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश...
प्रश्न: जीवन के किस मोड़ पर आपको ऐसा लगा कि प्राकृतिक खेती को मिशन बनाना चाहिए?
राज्यपाल: देखिए, हरियाणा के गुरुकुल कुरुक्षेत्र में देश के 14 प्रांतों के बच्चे वहीं रहकर अध्ययन करते हैं। मैं वहां 35 वर्षों तक प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत रहा। इसी गुरुकुल क्षेत्र के पास ही करीब 180 एकड़ का कृषि फार्म है। रासायनिक खेती से उपजे खाद्यान्नों से विद्यार्थियों को भोजन कराया जाता था। एक दिन जब मैं श्रमिकों से पेस्टिसाइट (कीटनाशक) डलवा रहा था तभी एक मजदूर छिड़काव करते समय बेहोश होकर गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया और दो-तीन दिन के इलाज के बाद जीवन बचा। मेरे मन में बात यह आई कि सिर्फ कीटनाशक के छिड़काव करते समय यह जान तक ले सकता है। यह जहरीला अनाज साग-सब्जी मैं अपने बच्चों को खिला रहा हूं। ऐसे में इनका भविष्य क्या होगा और इसका बच्चों पर क्या असर पड़ेगा। इस घटना ने मुझे उद्वेलित कर दिया।
प्रश्न: कैसे आप रासायानिक से जैविक और फिर प्राकृतिक खेती पर आए?
राज्यपाल: रासायनिक खेती का विचार छोडऩे के बाद मैं कई कृषि वैज्ञानिकों से मिला जिन्होंने जैविक (ऑर्गेनिक) खेती के बारे में बातचीत की। लेकिन जैविक खेती के लिए खाद बनाने में डेढ़-दो महीने लगते हैं। पहले साल इस खेती से कुछ नहीं मिला। अगले साल 50त्न और तीसरे साल 80त्न उत्पादन मिला। न मेहनत कम हुई और न ही खर्च कम हुआ। जैविक खेती का दुष्परिणाम श्रीलंका को भुगतना पड़ा है। मैंने हिसार के कृषि वैज्ञानिक डॉ हरिओम व अन्य कृषि वैज्ञानिकों से बातचीत की जिन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में बताया। मैंने जब 5 एकड़ में प्राकृतिक खेती शुरू की तो शुरू में न तो उत्पादन कम हुआ और बढ़ा भी नहीं। खर्च में कमी आई। अगले साल 10 एकड़ और फिर 100 एकड़ में यह खेती शुरू की।
प्रश्न: रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती में मूलभूत अंतर?
राज्यपाल: रासायनिक खेती वह खेती है जो डीएपी, पेस्टिसाइड डालकर की जाती है। इससे एक समय के बाद भूमि में कुछ पैदा नहीं होगा। जैविक खेती में खर्च कम नहीं होता और उत्पादन कम होता है। इसमें वर्मीकंपोस्ट बनाने वाला केंचुआ विदेश से आयात होते हैं। उत्पादन पहले दो तीन साल कम होता है। ये दोनों खेती ग्लोबल वार्मिंग को जन्म देती हैं जबकि प्राकृतिक खेती ग्लोबल वार्मिंग को खत्म करने का काम करती है। इस खेती में पानी की खपत 50त्न कम होती है और भूमिगत जल स्तर भी बढ़ता है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इससे उत्पन्न खाद्य पदार्थ खाने से हम स्वस्थ रहेंगे और बीमारियों से बचेंगे। लाखों-करोड़़ों रुपए वार्षिक बचेगा जो भारत सरकार यूरिया डीएपी पर सब्सिडी देती है।
प्रश्न: प्राकृतिक खेती कितनी बेहतर है और इसके क्या फायदे हैं?
राज्यपाल: प्राकृतिक कृषि विशुद्ध वैज्ञानिक भारतीय खेती है। इसमें सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या ज्यादा पाई गई। इसमें बहुफसलें (एक साथ कई फसल) उगाते हैं। सह फसलों से खर्चा निकल जाता है। किसानों की आमदनी बढ़ जाती है। जब हम प्राकृतिक खेती करेंगे तो केंचुआ सारी जमीन को मुलायम बना देता है। यदि सारी धरती पर प्राकृतिक खेती होगी तो बाढ़ आने की नौबत ही नहीं आएगी।
> Ram Naresh Ji:
प्रश्न: पूरे राज्य में किस तरह से जागरूकता फैलाई जा रही है?
राज्यपाल: 19 नवम्बर 2021 को डांग संपूर्ण प्राकृतिक खेती वाला जिला बन गया। वहां यूरिया, डीएपी व पेस्टिसाइड पर पूरी तरह प्रतिबंध है। गुजरात में एक भी जिला या गांव ऐसा नहीं है जहां पर यह खेती नहीं पहुंची है। यहां प्राकृतिक कृषि का अभियान तेजी से चल रहा है। राज्य में करीब 50 से 60 लाख किसान हैं। फिलहाल राज्य में लगभग 9 लाख किसान प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। अगले वर्ष तक यह संख्या 20 लाख तक पहुंच जाएगी। जिला कलक्टरों व जिला विकास अधिकारियों को भी इससे जोड़ा गया है। 5 गांवों का कलस्टर बनाकर किसानों को इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्राकृतिक खेती करने वाला एक किसान अन्य किसानों को इसके बारे में प्रशिक्षण देता है उसको सरकार मेहनताना भी दे रही है। महिला किसानों (कृषि सखी) को भी जोड़ा जा रहा है।
प्रश्न: प्राकृतिक कृषि को लेकर शिक्षा के क्षेत्र में क्या बदलाव?
राज्यपाल: गुजरात के चारों कृषि विश्वविद्यालयों में बीएससी और एमएससी के पाठ्यक्रमों में प्राकृतिक खेती को शामिल किया गया है। गुजरात विद्यापीठ के तीन कृषि विज्ञान केन्द्रों में भी रासायनिक खेती की जगह अब प्राकृतिक खेती होने लगी है।
दिनचर्या का हिस्सा बना पत्रिका
राज्यपाल ने कहा कि पत्रिका अखबार मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। सुबह छह बजे बिना विलंब के राजस्थान पत्रिका पढऩे बैठ जाता हूं। प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के आध्यात्मिकता के लेख काफी बेहतरीन होते हैं। आज के युग में अखबार के माध्यम से भारतीय जीवन मूल्य व ऋषियों की परंपरा को जनमानस तक पहुंचाना बहुत बड़ी बात है। ऐसा पत्रिका के अलावा कोई नहीं कर पा रहा। पत्रिका में ताजा जानकारी नपी तुली व व्यवस्थित रूप से प्रकाशित की जाती है। पत्रिका अखबार के माध्यम से राष्ट्र की सेवा करने में लगा है।
Published on:
09 Apr 2024 10:02 pm
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