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Gujarat news: गाय के गोबर से राखियां बना रहे हैं दिव्यांग

सजेंगी भाइयों की कलाइयों पर, राजस्थान से मंगाए जाते हैं गोबर के कैक: Gujarat news, cow dung, physical challeged, rakhi,

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Gujarat news: गाय के गोबर से राखियां बना रहे हैं दिव्यांग

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गांधीनगर. न ही ठीक से बोल सकते हैं न ही सुन सकते हैं। हाथ तक उनके बस में नहीं हैं, लेकिन कहते हैं न कि हौसले बुलंद हो तो हर राह आसान हो जाती है कुछ ये पंक्तियां सटीक बैठती हंै ऐसे सेरेब्रल पाल्सी दिव्यांग बच्चों पर जो इन दिनों खेड़ा जिले के नडियाद की मैत्री संस्था में राखियां बनाने में लगे हैं और वह भी वैदिक राखियां हैं। जो गाय के गोबर से तैयार करते हैं। कोरोना के हालातों के चलते इस संस्थान में बच्चों को ज्यादा नहीं बुलाया जाता है। इसके बावजूद भी इन दिव्यांग बच्चों ने 2 हजार ज्यादा राखियां बना चुके हैं। अगले चार-पांच दिनों में ढाई हजार तक राखिया बना लेंगे। ऐसी राखियों की बिक्री के लिए मैत्री संस्थान में स्टॉल भी लगाया गया है, जहां से लोग राखियां ले रहे है। रक्षाबंधन पर इन दिव्यांगों की बनाई राखियां भाइयों की कलाइयों पर सजेंगी।

बनाई जाती हैं वैदिक राखियां

मैत्री (एनजीओ) संस्थान के निदेशक मेहुल परमार बताते हैं कि यह एनजीओ दिव्यांग बच्चों की पुर्नस्थापना और उनकी देखभाल के तौर काम करता हैं। बच्चों को शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ बनाने के लिए रक्षाबंधन से पहले राखियां बनाना, दीपावली पर मोमबत्ती बनाने जैसे गुर सिखाए जाते हैं ताकि इन बच्चों के हाथों का संतुलन बने है। अलग-अलग रंगों की राखियां होने से उन्हें पहचान सकें। पिछले एक से डेढ़ माह से करीब पचास दिव्यांग बच्चे गाय के गोबर से इको फ्रेंडली वैदिक राखियां बना रहे है। कोरोना महामारी के चलते एक साथ ही इन बच्चों को बुलाना संभव नहीं था तो पांच-सात बच्चों के ग्रुप में एक दिन छोड़कर दूसरे दिन बुलाया जाता है। राखियां बनाने वाले बच्चों में मानसिक दिव्यांग, सेरेब्रल पाल्सी के शिकार बच्चे हैं।
वे बताते हैं कि राखियां बनाने में रुद्राक्ष, चन्दन (सुखड), मोती, क्रिस्टल जैसी सामग्री अहमदाबाद और सूरत से मंगाई गई है। राखियों की खासियत यह है कि ये राखियां गाय के गोबर से तैयार की गई है। इसके लिए राजस्थान की एक गोशाला से गाय के कैक (उपले) मंगाए गए थे। बाद में उन्हें तैयार कर छोटे-छोटे टुकडे करते हैं और रंगरूप देकर वैदिक राखियां बनाई जाती हैं।

बच्चों पर लगाते हैं राखियों से ेमिलने वाली आवक
वे बताते हैं न सिर्फ बच्चों ने अलग-अलग आकर्षक डिजाइनों में राखियां बनाई बल्कि संस्थान में राखियों की बिक्री भी की जा रही है। बच्चों को मदद करने के लिहाज से ज्यादातर लोग राखियां ले जाते हैं। जो राखियां बचती हैं उन्हें कच्ची बस्तियों में बांटी जाएंगी।
परमार बताते हैं कि चाहे दीपावली हो रक्षाबंधन हो या फिर उत्तरायण हो हर त्योहारों पर कोई न कोई वस्तुएं बनाई जाती हैं। दीपावली पर मोमबत्ती और आकर्षक दीपक ये बच्चे बनाते हैं। रक्षाबंधन पर राखियां बनाते हैं। राखियां बनाने का उद्देश्य बच्चों को रचनात्मक कार्यों को लेकर प्रोत्साहित करना है। हररोज एक बालक पांच से सात राखियां बनाता है।
चिकित्सा थैरेपी होती हैं

राखियां बनाने से इन दिव्यांग बच्चों में एकाग्रता बनती है। सेरेब्रल पल्सी के शिकार बच्चे जो किसी वस्तु को अच्छे से नहीं पाते। उनके हाथों का संतुलन बनता है। अलग-अलग रंगों की राखियां होने से वे रंगों को समझते हैं।