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आईआईएम-ए के सर्वे में सामने आए तथ्य: कोरोना के चलते ३० फीसदी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित

IIMA Survey, covid 19 school closures, unicef gujarat, online education एक से ज्यादा ४जी फोन, इंटरनेट रीचार्ज के पैसे न होना बड़ी बाधा, ७० फीसदी ने मोबाइल के जरिए ही पाई शिक्षा सामग्री, लाइव क्लास से सिर्फ ३० फीसदी ही जुड़े

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आईआईएम-ए के सर्वे में सामने आए तथ्य: कोरोना के चलते ३० फीसदी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित

आईआईएम-ए के सर्वे में सामने आए तथ्य: कोरोना के चलते ३० फीसदी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित

अहमदाबाद. कोरोना महामारी के चलते मार्च महीने से लागू किए गए लॉकडाउन के कारण अहमदाबाद के कम आय वाले अभिभावकों के ३० फीसदी स्कूली बच्चे शिक्षा से वंचित हो गए हैं। मार्च महीने के बाद से ही इन्हें किसी भी प्रकार की कोई शिक्षा नहीं मिल सकी है।
यह तथ्य भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद (आईआईएम-ए) और यूनिसेफ गुजरात की ओर से किए गए एक सर्वे में सामने आए हैं। आईआईएम-ए के नॉलेज मैनेजमेंट एंड इनोवेशन फॉर चेंज सेंटर के प्रोफेसर अंकुर सरीन व उनकी टीम ने यूनिसेफ गुजरात की चीफ ऑफिसर डा लक्ष्मी भवानी व टीम के साथ मिलकर यह सर्वे किया।
अहमदाबाद शहर में जुलाई से सितंबर महीने के दौरान किए गए रेपिड सर्वे में ऐसे ३७५ अभिभावकों से प्रश्न पूछे गए थे, जिनकी आय कम है।
इस सर्वे में सामने आया कि ३० फीसदी परिजनों के बच्चों को मार्च महीने से ही किसी भी प्रकार की कोई शिक्षा नहीं मिली है। इसमें निजी स्कूल में जाने वाले ३३ फीसदी बच्चे थे। जबकि सरकारी स्कूल में जाने वाले २६ फीसदी बच्चे। जबकि आरटीई के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश पाने वाले बच्चों की संख्या 22 फीसदी थी।
सरकार के ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था के निर्देश पर सरकारी, निजी स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई कराई। लेकिन सर्वे में सामने आया कि केवल ३० फीसदी बच्चे ही सही मायने में ऑनलाइन लाइव क्लास से जुड़े थे, जबकि ७० फीसदी बच्चों को तो मोबाइल फोन पर पर सोशल एप के जरिए ही शैक्षणिक सामग्री प्राप्त हुई। सरकारी स्कूल के २२ फीसदी बच्चे लाइव क्लास से जुड़ सके।
सर्वे में सामने आया कि ६० फीसदी से भी कम लोगों के पास ४ जी तकनीक वाले स्मार्ट फोन थे। जिनके पास थे भी उनके पास हाई स्पीड डाटा और उसको रिचार्ज करवाने के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी। जिससे शिक्षा प्रभावित हुई। घर में एक से ज्यादा स्मार्ट फोन की जरूरत महसूस हुई लेकिन इसके लिए सभी घरों में सुविधानहीं थी जिससे भी कई बच्चे शिक्षा से वंचित रहे।
सर्वे में यह भी सामने आया कि ३० फीसदी बच्चों का लॉकडाउन के दौरान अपने शिक्षकों से किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं हुआ। यानि उन्हें शिक्षा सामग्री तो मिली लेकिन उसकोलेकर कोई सवाल हो तो उसे हल करने का मार्गदर्शन उन्हें नहीं मिल सका।
१५ फीसदी सरकारी स्कूल के शिक्षकों ने रूबरू घर जाकर सामग्री पहुंचाई। जबकि निजी स्कूल के महज चार फीसदी शिक्षकों ने ही रूबरू परिजनों के घर जाकर शैक्षणिक सामग्री दी। निजी स्कूल के आरटीई वाले बच्चों के मामले में यह प्रतिशत आठ रहा।

८५ फीसदी को नहीं मिल सका मिडडे मील
कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के कारण स्कूल बंद होने से ८५ फीसदी बच्चों को मिड डे मील भी नहीं मिल सका। सर्वे में ८५ फीसदी परिजन ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के समय मिड डे मील या उसकी जगह और कुछ नहीं मिल सका। इसमें से ज्यादातर ने कहा क्योंकि वे राशन लेने स्कूल नहीं जा सके थे।

निजी स्कूलों से फीस का दबाव, कईयों ने छुड़ाया स्कूल
सर्वे में सामने आया कि सरकार ने बेशक निजी स्कूलों से फीस में राहत देने और वसूली के लिए दबाव न डालने को कहा हो, लेकिन ज्यादातर निजी स्कूलों की ओर से अभिभावकों से लंबित फीस भरने के लिए दबाव डाला गया। इसमें से आधे अभिभावकों ने कहा कि फीस देने में दिक्कत हुई तो स्कूलों ने उनके बच्चों का स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट जारी करने से इनकार कर दिया। इसके चलते जो अभिभावक फीस भरने में असमर्थ थे, उन्होंने या तो स्कूल बदल दिया या फिर बच्चों को एक साल घर पर बिठाने पर विवश कर दिया।